शहादत की लज़्ज़त

〽️दुनिया की बेशुमार नेअमतों से इंसान लुत्फ व लज़्ज़त हासिल करता है, किसी नेअमत को खाता है, किसी को पीता है, किसी को सूंघता है, किसी को देखता है, किसी को सुनता है और इन के अलावा मुख़्तलिफ तरीक़ों से तमाम नेअमतों को इस्तेमाल करता है और उन से महज़ूज़ होता है लेकिन मर्दे मोमिन को शहादत की जो लज़्ज़त हासिल होती है उस के सामने दुनिया की सारी लज़्ज़तें हेच हैं।

यहां तक कि शहीद जन्नत की तमाम नेअमतों से फाइदा उठाएगा और उन से लुत्फ अंदोज़ होगा मगर जब उस को अल्लाह व रसूल की मुहब्बत में सर कटाने का मज़ा याद आएगा तो जन्नत की भी सारी नेअमतों का मज़ा भूल जाएगा और तमन्ना करेगा कि ऐ काश! मैं दुनिया में वापस किया जाऊं और बार-बार शहीद किया जाऊं।

हदीस शरीफ में है सरकारे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि जन्नत में दाख़िल होने के बाद फिर कोई जन्नती वहां की राहतों और नेअमतों को छोड़ कर दुनिया में आना पसंद न करेगा कि जो चीज़ें हमें ज़मीन में हासिल थीं वह फिर मिल जाएं।

मगर शहीद आरजू करेगा कि वह फ़िर दुनिया की तरफ वापस. होकर अल्लाह की राह में दस मर्तबा क़त्ल किया

मिस्र की औरतें

〽️मिस्र के शरीफ घर की औरतों ने जब जुलैख़ा को हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम की मुहब्बत पर मलामत की और ताना दिया तो जुलैख़ा ने उन औरतों को बुलाया, उन के लिये दस्तर ख़्वान बिछवाया जिस पर तरह-तरह के खाने और मेवे चुने गए फिर जुलैख़ा ने हर औरत को फल वगैरा काटने के लिये एक-एक छुरी दी और हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया आप इन औरतों के सामने आ जाएं।

जब आप तशरीफ लाए और औरतों ने उनके जमाले जहां-आरा को देखा तो उन के हुस्न ने औरतों पर इतना असर किया कि बजाए लीमू के उन्हों ने अपने-अपने हाथों को काट लिया और खून बहने लगा मगर उन लोगों को हाथों के कटने का एहसास नहीं हुआ, इसी लिये उन्हों ने यह नहीं कहा कि हाए! हम तो अपने हाथ काट लिये बल्कि यह कहा कि यह इंसान नहीं हैं फिरिश्ता हैं।
 
#(सूरए यूसुफ, पाराः12, रुकूअः14)

और जब हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम के हुस्न का औरतों पर ऐसा असर हुआ कि उन को हाथ कटने की तक्लीफ

शहीद और ऐहसासे ज़ख़्म

〽️मैदाने जंग में शहीद हर तरह से ज़ख़्मी होता है कभी हाथ कटता है, कभी पांव घायल होता है, कभी उस के सीने में नेज़ा दाखिल किया जाता है, ख़ून का फव्वारा जारी होता है, कभी गर्दन कट के अलग हो जाती है और शहीद ख़ून में नहा कर ज़मीन पर गिर जाता है जिस से बज़ाहिर यह मालूम होता है कि उस को सख़्त तक्लीफ व अज़िय्यत होती है लेकिन हक़ीक़त यह है कि उस को बहुत मामूली सी तकलीफ होती है और उसे उन ज़ख्मों का पूरा ऐहसास नहीं होता।

मुख़्बिरे सादिक़ सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम इरशाद फ़रमाते हैं: शहीद क़त्ल की सिर्फ इतनी ही
तक्लीफ महसूस करता है जितनी कि तुम चुटकी भरने या चींवटी के काटने की तक्लीफ महसूस करते हो।
 
#(तिर्मिज़ी, मिश्कातः33)

मुम्किन है कोई कहे कि यह कैसे हो सकता है कि शहीद के हाथ पांव काट दिये गए और उसकी गर्दन भी जुदा कर दी गई मगर उसको सिर्फ इतनी तक्लीफ हुई जितनी चींवटी काटने या चुटकी भरने से होती है।

तो इस शुब्हा का जवाब यह है कि शहीद से यह शहीदे हक़ मुराद है जिस के दिल में अल्लाह और उस के रसूल की

शुहदा के फज़ाइल

〽️खुदाए अज़्ज़ व जल्ल शुहदा_ए_किराम की फज़ीलत बयान करते हुए क़ुरआने मजीद में इरशाद फरमाता है:

व ला तक़ुलू लि मै युक़ुतलु फी सबीलिल्लाही अम्वात बल अहया औं व लाकिल्ला तश्ऊरून

जो ख़ुदा की राह में क़ल्त किये जाएं उन्हें मुर्दा मत कहना बल्कि वह ज़िंदा हैं लेकिन तुम्हें ख़बर नहीं।
#(क़ुरआन करीम, पारा-2, रुकू-3)

और इरशाद फरमाता हैः
व ला तह्सबन्न्ल्ल ज़िन क़ुतिलू फ़ी सबीलिल्लाहि अम्वातन बल् अह्या औं इन्द रब्बीहिम् युर्ज़क़ून

जो लोग अल्लाह की राह में क़त्ल किये गए उन्हें मुर्दा हरगिज़ न ख़्याल करना बल्कि वह अपने रब के पास ज़िंदा हैं, रोज़ी दिये जाते हैं।
#(क़ुरआन करीम, पारा-4, रुकू-8)
हज़रत इब्ने मस्ऊद रदिअल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि मैं ने इस आयते करीमा का माना रसूले अक्रम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम से दर्याफ़्त किया तो आप ने इरशाद फरमाया कि शहीदों की रूहें सब्ज़ परिन्दों के जिस्म में हैं, उन के रहने के लिये अर्श इलाही के नीचे किन्दीलें लटकाई गई हैं। जन्नत में जहां उन का जी चाहता है वह सैर करते हैं और उसके मेवे खाते हैं।
#(मुस्लिम, मिश्कातः330)

और सरकारे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम शुहदा_ए_इस्लाम की अज़मत बयान करते हुए इरशाद फरमाते हैं कि शहीद के लिये ख़ुदा_ए_तआला के नज़दीक छः खूबियां हैं:

1). खून का पहला क़तरा गिरते ही उसे बख़्श दिया जाता है और रूह निकलने ही के वक़्त उस को जन्नत में उस का ठिकाना दिखा दिया जाता है।

2). क़ब्र के अज़ाब से महफूज़ रहता है।

3). उसे जहन्नम के अज़ाब का खौफ नहीं रहता।

4). उस के सर पर इज़्ज़त व वक़ार का ताज रखा जाएगा कि जिस का वेश बहा याकूत दुनिया और दुनिया की

शहीद की किस्में

शहीद की तीन किस्में हैं:

1- शहीदे हकीक़ी
2- शहीदे फिक़्ही और
3- शहीदे हुक्मी

जो अल्लाह की राह में क़त्ल किया जाए वह शहीदे हकीक़ी है और शहीदे फिक़्ही उसे कहते हैं कि आकिल बालिग़ मुसलमान जिसपर ग़ुस्ल फर्ज़ न हो वह तलवार व बंदूक वगैरा आलए जारिहा से ज़ुल्मन क़त्ल किया जाए और क़त्ल के सबब माल न वाजिब हुआ हो और न ज़ख़्मी होने के बाद कोई फायदा दुनिया से हासिल किया हो और न ज़िन्दों के अहकाम में से कोई हुकम उस पर साबित हुआ हो यानी अगर पागल, ना बालिग़ या हैज़ व निफास वाली औरतें और जुनुब शहीद किये जाएं तो वह शहीदे फिक़्ही नहीं और अगर क़त्ल से माल वाजिब हुआ हो जैसे कि लाठी से मारा गया या क़त्ले ख़ता कि मार रहा था शिकार को और लग गया किसी मुसलमान को, या ज़ख्मी होने के बाद खाया पिया, इलाज किया, नमाज़ का पूरा वक़्त होश में गुज़रा और वह नमाज़ पर क़ादिर था या किसी बात की वसिय्यत की तो वह शहीदे फिक़्ही नहीं। मगर शहीदे फिक़्ही न होने का यह माना नहीं कि वह शहीद होने का सवाब भी नहीं पाएगा बल्कि इस का मतलब सिर्फ इतना है कि उसे गुस्ल दिया जाएगा और शहीदे फिक़्ही नमाज़े जनाज़ा तो पढ़ी जाएगी मगर उसे गुस्ल नहीं दिया जाएगा वैसे ही खून के साथ दफन कर दिया जाएग और जो चीजें कि अज़ किस्म कफन नहीं होंगे उन्हें उतार लिया जाएगा जैसे ज़िरह, टोपी और हथियार वगैरा और कफन मस्नून में अगर कमी होगी तो उसे पूरा किया जाएगा, पाजामा नहीं उतारा जाएगा और सारे कपड़े उतार कर नए कपड़े नहीं दिये जाएंगे कि मक्-रूह है।

शहीदे हुक्मी यह है कि जो ज़ुल्मन नहीं क़त्त किया गया मगर कियामत के दिन वह शहीदों के गिरोह में उठाया जाएगा।

हदीस शरीफ में है कि सरकारे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि ख़ुदाए तआला की राह में शहीद किये जाने के अलावा सात शहादतें और हैं, जो ताऊन में मरे शहीद है, जो डूब कर मर जाए शहीद

जिब्राईल की मुशक़्क़त

〽️हुज़ूर सल्लअल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने एक मर्तबा जिब्राईल से पूछा- ऐ जिब्राईल! कभी तुझे आसमान से मुशक़्क़त के साथ बड़ी जल्दी और फ़ौरन भी ज़मीन पर उतरना पड़ा है?

जिब्राईल ने जवाब दिया- हाँ या रसूलल्लाहﷺ! चार मर्तबा ऐसा हुआ है के मुझे फ़ीअलफ़ोर बड़ी सरअत के साथ ज़मीन पर उतरना पड़ा।

हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया- वो चार मर्तबा किस-किस मौके पर?

जिब्राईल ने अर्ज़ किया-

1). एक तो जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में डाला गया तो मैं उस वक़्त अर्शे इलाही के नीचे था। मुझे हुक्म इलाही हुआ की जिब्राईल! ख़लील के आग में पहुँचने से पहले-पहले फ़ौरन मेरे ख़लील के पास पहुँचो। चुनाँचे मैं बड़ी सरअत के साथ फ़ौरन ही हज़रत ख़लील अलैहिस्सलाम के पास पहुंचा।

2). दूसरी बार जब हज़रत इसमाईल अलैहिस्सलाम की गर्दने अतहर पर छुरी रख दी गई तो मुझे हुक्म हुआ की छुरी चलने से पहले ही ज़मीन पर पहुँचो और छुरी को उल्टा दूं। चुनाँचे मैं छुरी के चलने से पहले ही ज़मीन पर पहुँच गया और छुरी को चलने ना दिया।

3). तीसरी मर्तबा जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को भाईयों ने कुँए में गिराया तो मुझे हुक्म हुआ की मैं यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के कुँए की तह तक पहुँचने से पहले-पहले ज़मीन पर पहुँचूं और कुंए से एक पत्थर निकाल कर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को उस पत्थर पर बाआराम बैठा दूं। चुनाँचे मैंने ऐसा ही किया।

4). और चौथी मर्तबा या रसूलल्लाहﷺ जबकी काफ़िरों ने हुज़ूर का दनदाने मुबारक शहीद किया तो मुझे हुक्म इलाही हुआ ﷺ मैं फौरन जमीन पहुँचूं और हुज़ूरﷺ के दनदाने मुबारक का खून मुबारक ज़मीन पर ना गिरने दूं और ज़मीन पर गिरने से पहले ही मैं वो खून मुबारक अपने हाथों पर ले लूं। या रसूलल्लाहﷺ! खुदा ने मुझे फ़रमाया था, जिब्राईल! अगर मेरे मेहबूब का ये खून ज़मीन पर गिर गया तो क़यामत तक ज़मीन में से ना कोई

ख़लील व जिब्राईल

〽️हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को नमरूद ने जब आग में फैंकना चाहा तो जिब्राईल अलैहिस्सलाम हाज़िर हुए और अर्ज़ किया- हुज़ूर! अल्लाह से कहिये वो आपको इस आतिशकदा से बचा ले।

आपने फरमाया- अपने जिस्म के लिए इतनी बुलंद व बाला पाक हस्ती से ये मामूली सा सवाल करूं?

जिब्राईल ने अर्ज़ किया तो अपने दिल के बचाने के लिए उससे कहिये फ़रमाया ये दिल उसी के लिए है वो अपनी चीज़ से जो चाहे सलूक करे।

जिब्राईल ने अर्ज किया- हुज़ूर! इतनी बड़ी तेज़ आग से आप क्यों नहीं डरते? फ़रमाया- ऐ जिब्राईल! ये आग किस ने जलाई? जिब्राईल ने जवाब दिया-नमरूद ने। फ़रमाया और नमरूद के दिल में ये बात किस ने डाली? जिब्राईल ने जवाब दिया- रब्बे जलील ने। ख़लील ने फरमाया

आतिश कदाऐ नमरूद

〽️ नमरूद मलऊन ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से जब मुनाज़रह में शिकस्त खाई तो और तो कुछ ना कर सका, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का जानी दुश्मन बन गया और आपको क़ैद कर लिया और फिर एक बहुत बड़ी चार दीवारी तैयार की और उसमें महीने भर तक बकोशिश किस्म-किस्म की लकड़ियाँ जमा कीं और एक अज़ीम आग जलाई।

जिसकी तपिश से हवा में उड़ने वाले परिन्दे जल जाते थे और एक मुनजनीक़ (गोफ़न ) तैयार करके खड़ी की और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बाँध कर उसमें रखकर आग में फेंका।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़बान पर उस वक़्त ये कलमा जारी था- "हसबीयल्लाहू व नीअमल वकील"

इधर नमरूद ने आपको आग में फेंका और इधर अल्लाह ने आग को हुक्म फ़रमाया की ऐ आग! ख़बरदार! हमारे ख़लील को मत जलाना, तू हमारे इब्राहीम पर ठंडी हो जा और सलामती का घर बन जा।

चुनाँचे वो आग हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए बाग व बहार बन गई और नमरूद की सारी कोशिश

ख़लील व नमरूद का मुनाज़रह

〽️हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जब नमरूद को ख़ुदा परस्ती की दअवत दी तो नमरूद और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम में हस्बे जेल मुनाज़रह हुआ।

नमरूदः तुम्हारा रब कौन है? जिसकी पर परसतिश की तुम मुझे दअवत देते हो?

हज़रत ख़लील अलैहिस्सलामः मेरा रब वो है जो ज़िन्दा भी कर देता है और मार भी डालता है।

नमरूदः ये बात तो मेरे अन्दर भी मौजूद है, लो अभी देखो मैं तुझे ज़िन्दा भी करके दिखाता हूँ और मार कर भी। ये कहकर नमरूद ने दो शख़्सों को बुलाया। उनमें से एक शख़्स को क़त्ल कर दिया और एक को छोड़ दिया और कहने लगा, देख लो एक को मैंने मार डाला और एक को गिरफ्तार करके छोड़ दिया, गोया उसे ज़िन्दा कर दिया। नमरूद की ये अहमक़ाना बात देख कर हज़रत ख़लील अलैहिस्सलाम ने एक दूसरी मुनाज़राना गुफ़्तगू फ़रमाई और फ़रमाया-

ख़लील अलैहिस्सलाम: मेरा रब सूरज को मशरिक़ की तरफ़ से लाता है तुझ में अगर ताक़त है तो तू मग़रिब

तीशाऐ ख़लील

〽️हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जब पैदा हुए तो नमरूद का दौर था और बुत परस्ती का बड़ा ज़ोर था। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम एक दिन उन बुत परस्तों से फरमाने लगे की ये तुम्हारी क्या हरकत है की उन मूर्तियों के आगे झुके रहते हो। ये तो परसतिश के लायक नहीं, परसतिश के लायक़ तो सिर्फ़ एक अल्लाह है।

वो लोग बोले- हमारे तो बाप दादा भी इन्हीं मूर्तियों की पूजा करते चले आए हैं मगर आज तुम एक ऐसे आदमी पैदा हो गए हो जो उनकी पूजा से रोकने लगे हो।

आपने फ़रमाया- तुम और तुम्हारे बाप दादा सब गुमराह हैं। हक़ बात यही है जो मैं कहता हूँ की तुम्हारा और ज़मीन व आसमान सबका रब वो है जिसने उन सब को पैदा फ़रमाया और सुन लो! मैं ख़ुदा की कसम खा कर कहता हूँ कि तुम्हारे इन बुतों को मैं समझ लूंगा।

चुनाँचे एक दिन जब की बुत परस्त अपने सालाना मेले पर बाहर जंगल में गए हुए थे। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उनके बुतख़ाने में तशरीफ़ ले गए और अपने तीशे से सारे बुत तोड़-फोड़ डाले और जो बड़ा बुत था, उसे ना तोड़ा और अपना तीशा उसके कंधे पर रख दिया, उस ख़याल से की बुत परस्त जब यहाँ आएँ तो अपने बुतों का ये हाल देख कर शायद उस बड़े बुत से पूछे की उन छोटे बुतों को ये कौन तोड़ गया है? और ये तीशा तेरे कंधे पर क्यों रखा है? और उन्हें उनका अज्ज़ ज़ाहिर हो और होश में आएँ की ऐसे आजिज़ खुदा नहीं हो सकते।

चुनाँचे जब वो लोग मेले से वापस आए और अपने बुतख़ाने में पहुँचे तो अपने मअबूदों का ये हाल देखकर की कोई इधर टूटा हुआ पड़ा है, किसी का हाथ नहीं तो किसी की नाक सलामत नहीं। किसी की गर्दन नहीं तो किसी

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और चार परिन्दे

〽️हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने एक रोज़ समुंद्र के किनारे एक आदमी मरा हुआ देखा। आपने देखा के समुद्र की मछलियाँ उसकी लाश को खा रही हैं और थोड़ी देर के बाद फिर परिन्दे आकर उसकी लाश को खाने लगे फिर आपने देखा के जंगल के कुछ दरिन्दे आए और वो भी उसकी लाश को खाने लगे।

आपने ये मंजर देखा तो आपको शौक़ हुआ की आप मुलाहेज़ा फ़रमाएँ की मुर्दे किस तरह ज़िन्दा किए जाएँगे।

चुनाँचे आपने ख़ुदा से अर्ज़ किया- इलाही! मुझे यकीन है की तू मुर्दों को जिन्दा फरमाएगा और उनके अज्ज़ाऐ दरयाई जानवरों, परिन्दों और दरिन्दों के पेटों से जमा फरमाएगा। लेकिन मैं ये अजीब मंज़र देखने की आरज़ू रखता हूँ।

खुदा ने फ़रमाया- अच्छा ऐ खलील! तुम चार परिन्दे लेकर उन्हें अपने साथ हिला लो ताकी अच्छी तरह उनकी शनाख़्त हो जाए। फिर उन्हें ज़िबह करके उनके अज्ज़ाऐ बाहम मिला जुला कर उनका एक-एक हिस्सा, एक-एक पहाड़ पर रख दो और फिर उनको बुलाओ और देखो वो किस तरह ज़िन्दा होकर तुम्हारे पास दौड़ते हुए आते हैं।

चुनाँचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मोर, कबूतर, मुर्ग़ और कव्वा, ये चार परिन्दे लिए और उन्हें ज़िबह किया और उनके पर उखाड़े, और उन सब का कीमा करके और आपस में मिला जुला कर उस मजमूऐ के कई हिस्से किए और एक-एक हिस्सा एक-एक पहाड़ पर रख दिया और सर सब के अपने पास महफूज़ रखे और फिर आपने उनसे फ़रमाया- “चले आओ" आपके फ़रमाते ही वो अज्ज़ा उड़े और हर-हर जानवर के अज्ज़ा अलेहदा-अलेहदा होकर अपनी तरतीब से जमा हुए और परिन्दों की शक्लें बनकर अपने पाँऊ से दौड़ते हुए हाज़िर हुए और अपने-अपने सरों से मिलकर बईनही पहले की तरह मुकम्मल होकर उड़ गए।

#(कुरआन करीम, पारा-3, रूकू-3, ख़ज़ायन-उल-इऱफान, सफा-66)


🌹सबक़ ~
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ख़ुदा तआला बड़ी क़ुदरत व ताक़त का मालिक है। कोई डूब कर मर जाए और उसे मछलियाँ खा जाएं या जल

हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम और ख़ुदा की क़ुदरत के करिश्मे

〽️बनी इस्राईल जब ख़ुदा की नाफरमानी में हद से ज्यादा बढ़ गए तो ख़ुदा ने उन पर एक ज़ालिम बादशाह बख़्त नस्र को मुसल्लत कर दिया। जिसने बनी इस्राईल को क़त्ल किया, गिरफ्तार किया और तबाह किया और बैत-उल-मुक़द्दस को बर्बाद व वीरान कर डाला।

हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम एक दिन शहर में तशरीफ़ लाए तो आपने शहर की वीरानी व बर्बादी को देखा, तमाम शहर में फिरे, किसी शख्स को वहाँ ना पाया। शहर की तमाम इमारतों को मुनहदिम देखा। ये मंज़र देख कर आपने बराह तआज्जुब फ़रमाया। अन्नीया यूहियी हाज़ीहिल्लाहू बअदा मौतिहा यअन ऐ अल्लाह! इस शहर की मौत के बाद उसे फिर कैसे ज़िंदा फ़रमाएगा?

आप एक दराज़ गोश पर सवार थे और आपके पास एक बर्तन ख़जूर और एक पियाला अंगूर के रास का था। आपने अपने दराज़गोश को एक दरख्त से बाँधा और उस दरख़्त के नीचे आप सो गए। जब सो गए तो खुदा में उसी हालत में आपकी रूह क़ब्ज़ कर ली और गधा भी मर गया।

इस वाक़ये के सत्तर साल बाद अल्लाह तआला ने शाहाने फ़ारस में से एक बादशाह को मुसल्लत किया और वो अपनी फ़ौजें लेकर बैत-उल-मुक़द्दस पहुँचा और उसको पहले से भी बेहतर तरीके पर आबाद किया और बनी इस्राईल में से जो लोग बाक़ी रहे थे, खुदा तआला उन्हें फिर यहाँ लाया और वो बैत-उल-मुक़द्दस और उसके नवाह में आबाद हुए और उनकी तअदाद बढ़ती रही। उस ज़माना में अल्लाह तआला ने हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम को दुनिया की आँखों से पौशीदा रखा और कोई आपको देख ना सका। जब आपकी वफ़ात को सौ साल गुज़र गए तो अल्लाह ने दोबारह आपको ज़िन्दा किया। पहले आँखों में जान आई। अभी तमाम जिस्म मुर्दा था। वो आपके देखते-देखते ज़िन्दा किया गया। जिस वक़्त आप सोए थे, वो सुबह का वक़्त था और सौ साल के बाद जब आप दोबारह ज़िन्दा किए गए तो ये शाम का वक्त था। खुदा ने पूछा। ऐ उज़ैर! तुम यहाँ कितने ठहरे? आपने अंदाज़े से अर्ज़ किया कि एक दिन या कुछ कम। आपका ख़याल ये हुआ के ये उसी दिन की शाम है जिसकी सुबह को सोए थे।

खुदा ने फ़रमाया- बल्की तुम तो सौ बरस ठहरे हो, अपने खाने और पानी यानी खजूर और अंगूर के रस को देखिये के वैसा ही है इसमें बू तक नहीं आई और अपने गधे को भी ज़रा देखिए। आपने देखा तो वो मरा हुआ और