Showing posts with label तिहत्तर में एक. Show all posts
Showing posts with label तिहत्तर में एक. Show all posts

▫पोस्ट--05 | ✅ तिहत्तर में एक ✅

पिछली 4 पोस्ट में आपने पढ़ ही लिया होगा कि इस उम्मत में 73 फिरके होंगे जिनमे 1 हक़ पर होगा और 72 जहन्नमी होंगे और इसके दलायल में मैं क़ुर्आनो हदीस और फुक़्हा के क़ौल भी नकल कर चुका और ये भी बता चुका कि फिरकों में बांटना सुन्नियों का काम नहीं बल्कि बातिल फिरकों का जनम खुद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने में यानि सहाब-ए किराम के दौर में हो चुका था, तो चलिए कुछ बातिल फिरकों के अक़ायद और उनकी तफसील मुलाहज़ा करिये~
 
 
1). क़दरिया - इस बातिल फिरके का बानी बसरा का रहने वाला एक शख्स जिसका नाम  मअबद जुहनी था और इसका अक़ीदा था कि इंसान खुद ही अपने अमल का ख़ालिक़ है जब वो कुछ करना चाहता है तब ही वो काम वजूद में आता है और तक़दीर कोई चीज़ नहीं यानि पहले से कुछ भी लिखा हुआ नहीं है और ये भी कि अल्लाह तआला को भी किसी काम का इल्म तब ही होता है जब बंदा कोई काम कर लेता है। मआज़ अल्लाह

हदीस - हज़रते यहया बिन मअमर से मरवी है कि सबसे पहले तक़दीर का जिसने इंकार किया वो मअबद जुहनी है यह्या कहते हैं की मैं और हुमैद बिन अब्दुर्रहमान हज के लिए मक्का मुअज़्ज़मा गए तो हमने कहा कि अगर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सहाबा में से हमें कोई मिला तो हम उनसे तक़दीर के बारे में मालूमात करेंगे, इत्तिफ़ाक से हमें अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मिल गए जो मस्जिद शरीफ में दाखिल हो रहे थे तो हम दोनों उनके दाएं और बाएं हो लिए, यह्या कहते हैं कि मैं जानता था कि हुमैद खुद बात ना करके मुझसे ही बात करवायेंगे लिहाज़ा मैंने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से अर्ज़ किया कि हमारे यहां कुछ लोग हैं जो क़ुर्आन पढ़ते हैं इल्मे दीन हासिल करते हैं और भी कुछ उनकी तारीफ करके मैंने कहा कि वो लोग खयाल करते हैं कि उनका अक़ीदा है कि तक़दीर कोई चीज़ नहीं है और इंसान का करना ही सब कुछ है और इंसान अपने कामों का खुद ही ख़ालिक़ है, ये सब सुनकर हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमाया कि जब तुम लोग उनसे मुलाकात करना तो मेरी तरफ से कह देना कि वो मेरे नहीं और मैं उनका नहीं फिर उसके बाद आपने कसम खा कर फरमाया कि अगर कोई शख़्स उहद पहाड़ के बराबर सोना राहे ख़ुदा में खर्च करे तो अल्लाह तआला उसकी ख़ैरात को हरगिज़ क़ुबूल ना करेगा जब तक कि वो तकदीर पर ईमान ना लाये, इसके बाद हज़रत ने हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की एक तवील हदीस हमको सुनाई जिसका मफहूम ये था कि अच्छी बुरी तक़्दीर का अक़ीदा रखना ईमान के लिए ज़रूरी है।

📕 मुस्लिम, जिल्द 1, सफह 27


हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद इनके बारे में पहले से ही फरमा दिया था, मुलाहज़ा फरमायें~

हदीस - क़दरिया इस उम्मत के मजूसी हैं अगर वो बीमार हों तो उनकी इयादत ना करो और अगर वो मर जायें तो उनके जनाज़े में शरीक ना हो।

📕 मिश्कात, बाबुल ईमान, सफह 22


एक मुसलमान को यही अक़ीदा रखना चाहिये कि कायनात में जो कुछ होता है उन सबका ख़ालिक़ो मालिक सिर्फ अल्लाह ही है और जो भी अच्छे या बुरे काम होते हैं वो सब पहले से लिखा हुआ है और

▫पोस्ट--04 | ✅ तिहत्तर में एक ✅

दौरे हाज़ा में एक जमाअत ऐसी भी पाई जाती है जो कि 73 फिरकों वाली हदीसे पाक का पूरा मफहूम ही बदलने पर उतर आई है, जैसा कि खुद मेरे साथ गुज़रा इलाहाबाद में मदरसा गरीब नवाज़ के एक मौलवी साहब हैं उनसे मेरी बात हुई तो कहने लगे कि 72 फिरकों में वहाबी, देवबंदी, शिया वगैरह शामिल नहीं हैं बल्कि इनके कुफ्र करने से ही ये उम्मते इजाबत से निकलकर उम्मते दावत में शामिल हो गये यानि काफिरों की जमाअत में खड़े हो गए तो मैंने पूछा कि फिर 73 फिरकों में कौन होगा तो बोले इससे मुसलमानों की अंदरूनी जमाअत जैसे क़ादिरी, चिश्ती, नक़्शबंदी, अबुल ओलाई, नियाज़ी, वारिसी, साबरी वग़ैरह मुराद हैं और ये सब के सब जन्नती हैं, मुझे बड़ी हैरत हुई मैंने कहा कि आज तक तो पूरी उम्मते मुस्लिमा यही अक़ीदा रखती है कि 72 फिरकों से मुराद वहाबी देवबंदी वगैरह ही हैं ये आज आपसे एक नई बात सुनने को मिली है तो क्या आज तक हमारे सारे आलिम गलत बयानी कर रहे थे तो कहने लगे कि हमारे उल्मा से इस हदीस को समझने में गलती हुई, खैर मुझे अल्लाह के फज़्ल से इतना इल्म तो था ही कि वो गलत बोल रहे हैं इसलिए मैं वहां से चला आया ये मुआमला 2012 में मेरे साथ पेश आया और उसके बाद से लेकर आज तक कभी उनके पास नहीं गया मगर उनका मुंह बंद करने के लिए मैंने बरैली शरीफ से एक इस्तिफता किया तो वहां से जवाब आया कि ऐसा शख्स गुमराह है और तौबा व तज्दीदे ईमान का हुक्म दिया गया (फतवे के लिए इमेज देखें), जब मैंने इसकी और तहक़ीक़ की तो मुझे पता चला कि ऐसा कहने वाला वो अकेला शख्स नहीं है बल्कि इसके पीछे पूरी एक लॉबी काम कर रही है और इनका मक़सद यही है कि ये खुद तो सुलह कुल्ली टाइप के लोग हैं और कुफ्रो इर्तिदाद की जो तलवार वहाबियों बदअक़ीदों पर लटक रही है उसी तलवार की ज़द में ये लोग खुद भी हैं लिहाज़ा ऐसी सूरत में ये चाहते हैं कि 72 फिरकों की हदीस का इन्कार कर दिया जाये यानि मायने ही बदल दिया जाये ताकि इस सूरत में अगर कोई इनको अहले  सुन्नत व जमाअत से खारिज भी कर देगा तब भी ये अपने आपको 72 फिरकों में गिनकर जन्नती होने का परवाना हासिल कर लेंगे मगर ये शायद भूल गये कि क़ुर्आनो हदीस का जो मायने हमारे अस्लाफ कर गए हैं वो क़यामत तक के लिए हमारे लिए पत्थर की लकीर है और वही हुक्म अल्लाह के नज़दीक भी है लिहाज़ा इनकी अपनी मन घड़न्त बातो से ये अपने आपको बहला तो सकते हैं मगर हमेशा के लिए जहन्नम में जाने से बचा नहीं सकते, इनके लिए बस एक ही रास्ता है या तो फौरन अपने किये पर शर्मिंदा होकर तौबा करें और पूरे तरीके से अक़ायदे अहले सुन्नत पर क़ायम हो जायें वरना जहन्नम में जाने के लिए तैयार रहे, एक और बात बअज़ जाहिल किस्म के लोग कुर्आन की एक आयत पेश करते हैं पहले वो आयत मुलाहज़ा करें~
 
 
कंज़ुल ईमान - और अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम लो सब मिलकर और आपस में फट ना जाना (फिरकों में ना बट जाना)।

📕 पारा 4, सूरह आले इमरान, आयत 103


इस आयत को पेश करके वो ये बताना चाहते हैं कि फिरके में बटने के लिए मौला तआला ने मना फरमाया है तो जो लोग फिरका-फिरका कर रहे हैं वो गलत राह पर हैं तो इसका जवाब ये है कि बेशक

▫पोस्ट--03 | ✅ तिहत्तर में एक ✅

हदीस - मेरी उम्मत का एक गिरोह क़यामत आने तक हक़ पर रहेगा और दुश्मन उसका कुछ ना बिगाड़ सकेंगे।.

📕 बुखारी, जिल्द 1, सफह 61

कहीं मेरे आक़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये फरमाते हैं कि मेरी उम्मत 73 फिरकों में बट जायेगी तो कहीं आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये फरमाते हैं कि मेरी उम्मत का एक ही गिरोह हक़ पर रहेगा तो मानना पड़ेगा कि उम्मत तो फिरको में बटेगी और उनमे 1 ही हक़ पर होगा बाक़ी सब जहन्नमी और उस एक का नाम अहले सुन्नत व जमाअत है, इस बात की दलील मैं पिछली पोस्ट में दे चुका हूं फिर भी कुछ और मुलाहज़ा फरमा लें~

हदीस - हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि मेरी उम्मत गुमराही पर जमा ना होगी और जब तुम इख्तिलाफ देखो तो बड़ी जमाअत को लाज़िम पकड़ो।

📕 इब्ने माजा, सफह 283


अब बड़ी जमाअत से क्या मुराद है और कौन बड़ी जमाअत है वो भी इसी हदीस के मातहत इसी इब्ने माजा शरीफ के हाशिये में लिखा है कि~

फुक़्हा - बा वजूद तमाम 72 फिरकों के अगर वो मिलाकर भी तुम देखो तो वो अहले सुन्नत के दसवें हिस्से को भी नहीं पहुंचते ।

📕 इब्ने माजा, हाशिया 1, सफह 292


बाक़ायदा नाम के साथ फरमाया गया है कि बड़ी जमाअत अहले सुन्नत व जमाअत ही है लिहाज़ा इसमें ज़र्रा बराबर भी शक व शुबह की गुंजाइश नहीं कि अहले सुन्नत ही हक़ पर है, अब रही इसकी बात कि

▫पोस्ट--02 | ✅ तिहत्तर में एक ✅

🔆 जो लोग सुन्नियों से ये कहते नज़र आते हैं कि मुसलमानो को फिरकों में क्यों उलझा रखा है दर असल वो जाहिल अहमक़ और बे ईमान किस्म के लोग हैं वरना आफताब रौशन दलीलों से रद्द गरदानी ना करते क्योंकि फिरका सुन्नी नहीं बनाते बल्कि कुछ बे ईमान लोग अहले सुन्नत व जमाअत से निकलकर एक अलग गुमराह जमाअत बना डालते हैं सुन्नी बस उसी गुमराह जमाअत की निशान देही कराता है, और रही फिरक़ा बनने की बात तो ये तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़मानये मुबारक में ही शुरू हो गया था कुछ बे ईमान मुसलमानों से अलग एक जमाअत बना चुके थे जिसे मुनाफिक़ कहा गया और उन मुनाफिक़ों के हक़ में कई आयतें नाज़िल हुई और कई हदीसे पाक मरवी है, मुलाहज़ा फरमायें ~

कंज़ुल ईमान - मुनाफेक़ीन जब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर होते हैं तो कहते हैं कि हम गवाही देते हैं कि बेशक हुज़ूर यक़ीनन खुदा के रसूल हैं और अल्लाह खूब जानता है कि बेशक तुम ज़रूर उसके रसूल हो, और अल्लाह गवाही देता है कि बेशक ये मुनाफिक़ ज़रूर झूठे हैं........इज़्ज़त तो अल्लाह और उसके रसूल और मुसलमानों के लिए है मगर मुनाफिकों को खबर नहीं ।

📕 पारा 28, सूरह मुनाफिक़ून,आयत 1/8


कंज़ुल ईमान - कहते हैं हम ईमान लाये अल्लाह और रसूल पर और हुक्म माना, फिर कुछ उनमें से उसके बाद फिर जाते हैं और वो मुसलमान नहीं ।

📕 पारा 18,सूरह नूर,आयत 47


कंज़ुल ईमान - ये गंवार कहते हैं कि हम ईमान लाये तुम फरमा दो कि तुम ना लाये हां युं कहो कि हम मुतीउल इस्लाम हुए, ईमान अभी तुम्हारे दिलो में कहां दाखिल हुआ।

📕 पारा 26, सूरह हुजरात, आयत 14


कंज़ुल ईमान - तो क्या अल्लाह के कलाम का कुछ हिस्सा मानते हो और कुछ हिस्सों के मुनकिर हो, तो जो कोई तुममें से ऐसा करे तो उसका बदला दुनिया की ज़िन्दगी में रुस्वाई और क़यामत के दिन सबसे ज़्यादा अज़ाब की तरफ पलटे जायेंगे, और अल्लाह तुम्हारे करतूतों से बे खबर नहीं । यही लोग हैं जिन्होंने अक़्ल बेचकर दुनिया खरीदी, तो ना उन पर से कुछ अज़ाब हल्का हो और न उनको मदद पहुंचे।

📕 पारा 1, सूरह बक़र, आयत 85-86


इन आयतों को ग़ौर से पढ़िये और बताइये कि वो कौन लोग थे जो अल्लाह पर ईमान लाते थे जो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नुबूवत की गवाही देते थे, ज़ाहिर सी बात है कि काफिर तो ऐसा करते नहीं हैं क्योंकि वो तो सिरे से मुनकिर हैं तो मानना पड़ेगा कि ये वही लोग थे जो बज़ाहिर तो दाढ़ी रखते, टोपी लगाते, नमाज़ पढ़ते रोज़ा रखते, हज करते, ज़कात देते, मगर फिर भी दिल से ईमान नहीं लाते थे और ये वही लोग थे जो क़ुर्आन की वो आयतें मानते जो इनके लिए नफा बख्श होती और जो इनके हक़ में ना होती यानि जिनसे अम्बिया व औलिया की शान बयान होती उसका फौरन इंकार कर देते, मुनाफिक़ की यही खसलत वहाबी, देवबंदी, क़ादियानी, खारजी, राफ्ज़ी, अहले हदीस, जमाअते इस्लामी और तमाम बदमज़हबो के अंदर पाई जाती है कि क़ुर्आन की जो आयत इनके हक़ में है उस पर फौरन ईमान ले आये और जो इनके हक़ में नहीं

▫पोस्ट--01 | ✅ तिहत्तर में एक ✅

🌹 हदीस - हज़रत इब्ने उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूले करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मेरी उम्मत पर एक ज़माना ज़रूर ऐसा आयेगा जैसा कि बनी इस्राईल पर आया था बिल्कुल हु बहु एक दूसरे के मुताबिक, यहां तक कि बनी इस्राईल में से अगर किसी ने अपनी मां के साथ अलानिया बदफेअली की होगी तो मेरी उम्मत में ज़रूर कोई होगा जो ऐसा करेगा और बनी इस्राईल 72 मज़हबो में बट गए थे और मेरी उम्मत 73 मज़हबो में बट जायेगी उनमें एक मज़हब वालों के सिवा बाकी तमाम मज़ाहिब वाले नारी और जहन्नमी होंगे सहाबये किराम ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वह एक मज़हब वाले कौन होंगे तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि वह लोग इसी मज़हबो मिल्लत पर कायम रहेंगे जिस पर मैं हूं और मेरे सहाबा हैं ।

📕 तिर्मिज़ी,हदीस नं 171
📕 अबु दाऊद,हदीस नं 4579
📕 इब्ने माजा,सफह 287
📕 मिश्कात,जिल्द 1,सफह 30


💝 तशरीह - हज़रत शेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु इस हदीस शरीफ के तहत फरमाते हैं कि "निजात पाने वाला फिरक़ा अहले सुन्नत व जमाअत का है अगर ऐतराज़ करे कि कैसे नाजिया फिरक़ा अहले सुन्नत व जमाअत है और यही सीधी राह है और खुदाये तआला तक पहुंचाने वाली है और दूसरे सारे रास्ते जहन्नम के रास्ते हैं जबकि हर फिरक़ा दावा करता है कि वो राहे रास्त पर है और उसका मज़हब हक है तो इसका जवाब ये है कि ये ऐसी बात नहीं जो सिर्फ दावे से साबित हो जाये बल्कि इसके लिए ठोस दलील चाहिये, और अहले सुन्नत व जमाअत की हक़्क़ानियत की दलील ये है कि ये दीने इस्लाम हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से मन्क़ूल होकर हम तक पहुंचा है और अक़ायदे इस्लाम मालूम करने के लिए सिर्फ अक़्ल का ज़रिया काफी नहीं है, जबकि हमें अखबारे मुतवातिर से मालूम हुआ और आसारे सहाबा और अहादीसे करीमा की तलाश से यक़ीन हुआ कि सल्फ सालेहीन यानि सहाबा ताबईन और उनके बाद के तमाम बुज़ुर्गाने दीन इसी अक़ीदा और इसी तरीक़े पर रहे और अक़्वाले मज़ाहिब में बिदअत व नफसानियत ज़मानये अव्वल के बाद पैदा हुई, सहाब-ए किराम और सल्फ मुताक़द्देमीन यानि ताबईन तबअ ताबईन व मुज्तहेदीन में से कोई भी उस नए मज़हब पर नहीं थे उससे बेज़ार थे बल्कि नए मज़हब के ज़ाहिर होने पर मुहब्बत और उठने बैठने का जो लगाओ पहले क़ौम के साथ था वो तोड़ लिया और ज़बानो क़लम से उसका रद्द फरमाया ।

सियाह सित्तह व हदीस की दूसरी मुसतनद किताबों की जिन पर अहकामे इस्लाम का मदार व मबनी हुआ उसके मुहद्देसीन और हनफी शाफई मालिकी व हंबली के फुक़्हा व अइम्मा और उनके अलावा दूसरे उल्मा जो उनके तबक़े में थे सब इसी मज़हबे अहले सुन्नत व जमाअत पर क़ायम थे, इसके अलावा अशारिया व मातुरीदिया जो उसूले कलाम के अइम्मा हैं उन्होंने भी सल्फ के मज़हब यानि अहले सुन्नत व जमाअत की ताईद व हिमायत फरमाई और दलायले अक़्लिया से इसे साबित फरमाया और जिन बातों पर सुन्नते रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और इजमाये सल्फ सालेहीन जारी रहा उसको ठोस क़रार दिया इसीलिए अशारिया