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🛁 ग़ुस्ल का बयान 🛁

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सवाल:- गुस्ल करने का तरीका क्या है❓

जवाब:- गुस्ल करने का तरीका यह है कि पहले गुस्ल की नीयत करके दोनों हाथ गट्टों तक तीन बार धोए फिर इसतिनजा की जगह धोए उसके बाद बदन पर अगर कहीं नजासते हकीकीया यानी पेशाब या पाखाना वगैरह हो तो उसे दूर करे फिर नमाज़ जैसा वज़ू करे मगर पाँव न धोए हाँ अगर चौकी या पत्थर वगैरह ऊँची चीज़ पर नहाए तो पांव भी धोले । इसके बाद बदन पर तेल की तरह पानी चुपड़े फिर तीन बार दाहिने कंधे पर पानी बहाए और फिर तीन बार बायें कंधे पर फिर सर पर और तमाम बदन पर तीन बार पानी बहाए तमाम बदन पर हाथ फेरे और मले फिर नहाने के बाद फौरन कपड़ा पहन ले।


सवाल:- गुस्ल में कितनी बातें फर्ज हैं ❓

जवाब:- गुस्ल में तीन बातें फर्ज हैं - कुल्ली करना, नाक में सख्त हड्डी तक पानी चढ़ाना, तमाम जाहिर बदन पर सर से पांव तक पानी बहाना।


सवाल:- गुस्ल में कितनी बातें सुन्नत हैं ❓

जवाब:- गुस्ल में यह बातें सुन्नत हैं- गुस्ल की नीयत करना, दोनों हाथ गट्टों तक तीन बार धोना, इसतिनजा की जगह धोना, बदन पर जहां कहीं नजासत हो उसे दूर करना, नमाज़ जैसा वज़ू करना, बदन पर तेल की तरह पानी

🚿 वज़ू का बयान 🚿

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सवाल:- वज़ू करने का तरीका क्या है❓

जवाब:- वज़ू करने का तरीका यह कि पहले तस्मिया
(बिस्मिल्लह) पढ़े फिर मिसवाक करे अगर मिसवाक न हो तो उंगली से दांत मसले फिर दोनों हाथों को गट्टों तक तीन बार धोए पहले दाहिने हाथ पर पानी डाले फिर बाएं हाथ पर दोनों हाथों को एक साथ न धोए फिर दाहिने हाथ से तीन बार कुल्ली करे फिर बाएं हाथ की छोटी उंगली से नाक साफ करे और दाहिने हाथ से तीन बार नाक में पानी चढ़ाए फिर पूरा चेहरा धोए यानी पेशानी पर बाल उगने की जगह से ढोड़ी के नीचे तक और एक कान की लौ से दूसरे कान की लौ तक हर हिस्सा पर तीन बार पानी बहाए इसके बाद दोनों हाथ कुहनियों समेत तीन बार धोए उंगलियों की तरफ से कुहनियों के ऊपर तक पानी डाले कुहनियों की तरफ से न डाले फिर एक बार दोनों हाथ से पूरे सर का मसह करे फिर कानों का और गर्दन का एक एक बार मसह करे फिर दोनों पांव टखनों समेत तीन बार धोए।


सवाल:- धोने का क्या मतलब क्या है❓

जवाब:- धोने का मतलब यह है कि जिस चीज को धोवो उसके हर हिस्सा पर पानी बह जाए।


सवाल:- अगर कुछ हिस्सा भीग गया मगर उस पर पानी नहीं बहा तो वज़ू होगा या नहीं❓

जवाब:- इस तरह वज़ू हरगिज़ न होगा भीगने के साथ हर हिस्सा पर पानी बह जाना जरूरी है।


सुवाल:- वज़ू में कितनी चीजें फर्ज हैं❓

जवाब:- वज़ू में चार चीजें फुर्ज हैं। अव्वल मुंह धोना यानी बाल निकलने की जगह से ठोड़ी के नीचे तक और एक

✴️ बिदअत का बयान ✴️

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सवाल:- बिदअत किसे कहते हैं और उसकी कितनी किस्में हैं❓

जवाब:- इसतिलाहे शरा (इस्लामी बूली) में बिदअत ऐसी चीज़ के ईजाद करने को कहते हैं जो हुजर अलैहिस्सलाम के जाहिरी जमाना में न हो ख्वाह वह चीज़ दीनी हो या दुनियावी ~(अशिअतुल्लमआत जिल्द अव्वल सफा 125)

और बिदअत की तीन किस्में हैं - बिदअते हसना, बिदअते सय्येआ, बिदअते मुबाहा।

बिदअते हसना वह बिदअत है जो कुरान व हदीस के वसूल व क़वाइद के मुताबिक हो और उन्हीं पर कियास किया गया हो उस की दो किस्में हैं। अव्वल बिदअतेवाजिबा जैसे कुरान व हदीस समझने के लिए इल्मे नह्-व का सीखना और गुमराह फ़िरके मसलन खारजी, राफ़जी, कादियानी और वहाबी वगैरा पर रद के लिए दलाइल कायम करना।
दोम बिदअते मुसतहब्बा जैसे मदरसों की तामीर और हर वह नेक काम जिसका रवाज इबतिदाए जमाना में नहीं था जैसे अज़ान के बाद सलात पुकारना, दुरै मुख्तार बाबुल अज़ान में हैं कि अज़ान के बाद अस्सलातु वस्सल्लमु अलैक या रसूलल्लाह पुकारना, माहे रबीउल आखिर सन् 781 हिजरी में जारी हुआ और यह बिदअते हसना है।


सवाल:- बिदअते सय्येआ किसे कहते हैं और उसकी कितनी किस्में हैं ❓

जवाब:- बिदअते सय्येआ वह बिदअत है जो कुरान व हदीस के उसूल व क़वाइद के मुखालिफ़ हो। ~(अशिअतुल्लम आतजिल्द अव्वल सफा 125)

उसकी दो किस्में हैं -
अव्वल बिदअते मुहर्रमा जैसे हिन्दुस्तान की मुख्वजा ताजियादारी (फ़तावा अजीजिया रिसाला ताजियादारी आला हज़रत) और जैसे अहलेसुन्नत व जमाअत के खिलाफ़ नए अकीदा वालों के मजाहिब। -(अशिअतुल्लमआत जिल्द अव्वल सफा 125)

दोम बिदअते मकरुहा जैसे जुमा व ईदैन का खुतबा गैरे अरबी में पढ़ना।


सवाल:- बिदअते मुबाहा किसे कहते हैं❓

जवाब:- जो चीज़ हुजूर अलैहिस्सलाम के जाहिरी जमाना में न हो और जिसके करने न करने पर सवाब व अज़ाब

✴️ शिर्क व कुफ्र का बयान ✴️

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सवाल:-  शिर्क किसे कहते हैं ❓

जवाब:-  खुदायेतआला की जात व सिफ़ात में किसी को शरीक ठहराना शिर्क है।

ज़ात में शरीक ठहराने का मतलब यह है कि दो या दो से जियादा खुदा माने जैसे ईसाई कि तीन खुदा मान कर मुश्रिक हुए और जैसे हिन्दू कि कई खुदा मानने के
सबब मुश्रिक हैं।

और सिफ़ात में शरीक ठहराने का मतलब यह है कि खुदायेतआला की सिफ़ात की तरह किसी दूसरे के लिए कोई सिफ़त साबित करे मसलन सुनना और देखना वगैरा
जैसा कि खुदायेतआला के लिए बगैर किसी के दिए जाती तौर पर साबित है, उसी तरह किसी दूसरे के लिए सुनना और देखना वगैरा जाती तौर पर माने कि बगैर खुदा के दिए उसे यह सिफ़तें खुद हासिल हैं तो शिर्क है और अगर किसी दूसरे के लिए अताई तौर पर माने कि खुदायेतआला ने उसे यह सिफ़ते अता की हैं तो शिर्क नहीं जैसा कि अल्लाहतआला ने खुद इन्सान के बारे में पारा 29 रुकू 19 में फ़रमाया जिसका तर्जमा यह है कि हमने इन्सान को सुनने वाला, देखने वाला बनाया।


सवाल:-  कुफ्र किसे कहते हैं ❓

जवाब:-  जरूरियाते दीन में से किसी एक बात का इन्कार करना कुफ़्र है।

जरूरियाते दीन बहुत हैं उनमें से कुछ यह है 👇
खुदायेतआला को एक और वाजिबुलवजूद मानना,
उसकी जात व सिफ़ात में किसी को शरीक न समझना,
जुल्म और झूट वगैरा तमाम उयूब से उसको पाक मानना,
उसके मलाइका और उसकी तमाम किताबों को मानना, कुरान मजीद की हर आयत को हक समझना,
हुजूर सैय्यिदे आलम सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम और
तमाम अंबियायेकिराम की नुबूवत को तस्लीम करना उन सबको अज़मत वाला जानना, उन्हें जलील और छोटा

✴️ मरने के बाद जिन्दा होना ✴️

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सवाल:-  मरने के बाद जिन्दा होने का मतलब क्या है ❓

जवाब:-  मरने के बाद जिन्दा होने का मतलब यह है कि
कियामत के दिन जब जमीन, आसमान, इन्सान और फ़रिश्ते वगैरा सब फ़ना हो जाएंगे तो फिर खुदायेतआला जब चाहेगा हज़रते इसराफील अलैहिस्सलाम को जिन्दा फ़रमाएगा वह दोबारा सूर फूकेंगे तो सब चीजें मौजूद हो जाएंगी।

फ़रिश्ते और आदमी वगैरा सब जिन्दा हो जाएंगे मुरदे अपनी अपनी कबरों से उठेगे, हश्र के मैदान में खुदायेतआला के सामने पेशी होगी, हिसाब लिया जाएगा और हर शख्स को अच्छे बुरे कामों को बदला दिया जाएगा यानी अच्छों को जन्नत मिलेगी और बुरों को जहन्नम में भेज

✴️ तकदीर का बयान ✴️

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सवाल:-  तकदीर किसे कहते हैं ❓

जवाब:-  दुनियां में जो कुछ होता है और बन्दे जो कुछ भलाई बुराई करते हैं खुदायेतआला ने उसे अपने इल्म के मुआफिक पहले से लिख लिया है उसे तक़दीर कहते हैं।


सवाल:- क्या अल्लाहतआला ने जैसा हमारी तकदीर में लिख दिया है हमें मजबूरन वैसा करना पड़ता है ❓

जवाब:-  नहीं, अल्लाहतआला के लिख देने से हमें मजबूरन वैसा करना नहीं पड़ता है बल्कि हम जैसा करने वाले थे अल्लाह तआला ने अपने इल्म से वैसा लिख दिया अगर किसी की तकदीर में बुराई लिखी तो इस लिए कि वह बुराई करने वाला था, अगर वह भलाई करने वाला होता तो खुदायेतआला उसकी तकदीर में भलाई लिखता।

खुलासह यह कि खुदायेतआला के लिख देने से बन्दा किसी काम के करने पर मजबूर नहीं किया

✴️ कियामत का बयान ✴️

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सवाल:-  कियामत किसे कहते हैं ❓

जवाब:-  कियामत उस दिन को कहते हैं जिस दिन हज़रते इसराफील अलैहिस्सलाम सूर फेंकेंगे, सूर सींग के शक्ल की एक चीज़ है जिसकी आवाज सुनकर सब आदमी और तमाम जानवर मर जाएंगे। जमीन, आसमान, चांद, सूरज और पहाड़ वगैरह दुनिया की हर चीज़ टूट फूट कर फ़ना हो जाएगी यहां तक कि सूर भी खत्म हो जाएगा और इसराफ़ील अलैहिस्सलाम भी फ़ना हो जाएंगे, यह वाकिअह मुहर्रम की दसवीं तारीख जुमा के दिन होगा।


सवाल:-  कियामत की कुछ निशानियां बयान कीजिए❓

जवाब:-  जब दुनिया में गुनाह ज्यादा होने लगे,
"हराम" कामों को लोग खुल्लमखुल्ला करने लगें,
मां बाप को तकलीफ दें और गैरों से मेल जोल रख्खें,
अमानत में खियानत करें,
“ज़कात" देना लोगों पर गिरा गुजरे,
दुनियां हासिल करने के लिए इल्मेदीन पढ़ा जाए,
“नाच-गाने" का रवाज ज्यादा हो जाए,
बदकार लोग कौम के पेशवा और लीडर हो जाएं,
चरवाहे वगैरह कम दर्जा के लोग बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों और कोठियों में रहने लगें तो समझ लो कि कियामत करीब

✴️ हमारे नबी ﷺ ✴️

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सवाल:-  हमारे नबी कौन हैं ❓ उनका कुछ हाल बयान कीजिए❓

जवाब:-  हमारे नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम हैं, जो 12 रबीउल अव्वल मुताबिक 20 अप्रैल सन् 571 ई0 में मक्का शरीफ में पैदा हुए। उनके वालिद का नाम हजरते अब्दुल्लाह और वालिदा का नाम हज़रते आमिना है (रज़ियल्लाहु तआला अनहुमा) ।

आप की जाहिरी ज़िन्दगी तिरसठ (63) बरस की हुई, तिरपन (53) बरस की उम्र तक मक्का शरीफ में रहे फिर दस साल मदीना तैयिबा में रहे ।

12 रबीउल अव्वल सन् 11 हिजरी मुताबिक 12 जून सन् 632 ई0 में वफात पाई, आपकी मजारे मुबारक मदीना शरीफ में है, जो मक्का शरीफ़ से तकरीबन 320 किलो मीटर उत्तर है।


सवाल:-  हमारे नबी की कुछ खूबियां बयान कीजिए ❓

जवाब:-  हमारे नबी सैयिदुल अंबिया और नबीयुल अंबिया हैं यानी अंबियाएकिराम के सरदार हैं और तमाम अंबिया हुजूर के उम्मती हैं। आप खातमुन्नबीईन हैं यानी आप के बाद कोई नबी नहीं पैदा होगा जो शख्स आप के बाद नबी होने को जाइज समझे वह काफ़िर है। सारी मखलूकात खुदायेतआला की रज़ा चाहिती है और खुदायेतआला हुजूर की रजा चाहता है। हुजूर की फरमाबरदारी अल्लाहतआला की फरमाबरदारी है। जमीन व आसमान की सारी चीजें आप पर जाहिर थीं दुनिया के हर गोशे और हर कोने में कियामत तक जो कुछ होने वाला है हुज़र उसे इस तरह मुलाहिजा फ़रमाते हैं जैसे कोई अपनी हथेली देखे, ऊपर नीचे आगे और पीठ के

✴️ रसूल और नबी ✴️

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सवाल:-  रसूल और नबी कौन होते हैं ❓

जवाब:-  रसूल और नबी खुदायेतआला के बन्दे और इन्सान होते हैं। अल्लाह तआला ने उनको इन्सान की हिदायत के लिए दुनियां में भेजा है। वह बंदों तक खुदायेतआला का पैगाम पहुंचाते हैं। मुअजिज़े दिखाते हैं और गैब की बातें बताते हैं, झूट कभी नहीं बोलते वह हर गुनाह से पाक साफ़ होते हैं।

उनकी तादाद कुछ कम व बेश एक लाख चौबीस हजार या तकरीबन दो लाख चौबीस हजार है, सब से पहले नबी हजरते आदम अलैहिस्सलाम हैं और सबसे आखिरी नबी हमारे पैगम्बर हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं।


सवाल:-   क्या हम हिन्दुओं के पेशवावों को नबी कह सकते हैं❓

जवाब:-   किसी शख्स को नबी कहने के लिए कुरान व हदीस से सुबूत चाहिए और हिन्दुओं के पेशवावों

✴️ खुदाये तआला की किताबें ✴️

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सवाल:-  खुदाये तआला की किताबें कितनी हैं ❓

जवाब:- खुदाये तआला की छोटी बड़ी बहुत सी किताबें नाज़िल हुई बड़ी किताब को किताब और छोटी को सहीफ़ह कहते हैं, उनमें चार किताबें बहुत मशहूर हैं अव्वल तौरेत जो हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई, दूसरे जबूर जो हज़रते दाऊद अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई, तीसरी इन्जील जो हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम पर नाजिल हुई और चौथी कुरान मजीद जो हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर नाजिल हुआ ।


सवाल:-  पूरा कुरान मजीद एक दफा नाज़िल हुआ या
थोड़ा-थोड़ा ❓

जवाब:-  पूरा कुरान मजीद एक दफ़ा इकट्ठा नहीं नाज़िल हुआ बल्कि ज़रूरत के मुताबिक 23 (तेईस) बरस में थोड़ा-थोड़ा नाज़िल हुआ।


सवाल:-  क्या कुरान मजीद की हर सूरत और हर आयत पर ईमान लाना ज़रूरी है ❓

जवाब:-  हां कुरान मजीद की हर सूरत पर ईमान लाना जरूरी है अगर एक आयत का भी इन्कार कर दे या यह

✴️ फ़रिश्ते ✴️

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सवाल:-  फ़रिश्ते क्या चीज़ हैं ❓

जवाब:-  फ़रिश्ते इन्सान की तरह एक मखलूक हैं लेकिन वह नूर से पैदा किए गए हैं। न वह मर्द हैं न औरत हैं, न कुछ खाते हैं न कुछ पीते हैं। जितने काम खुदायेतआला ने उनके सिपुर्द किया है उसी में लगे रहते हैं।

कुछ फ़रिश्ते बंदों का अच्छा बुरा अमल लिखने पर मुकर्रर हैं जिनको किरामन कातिबीन कहा जाता है।

कुछ फ़रिश्ते कब्र में मुर्दों से सुवाल करने पर मुक़र्रर हैं, जिनको मुनकर नकीर कहा जाता है और कुछ फ़रिश्ते हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के दरबार में मुसलमानों के दुरुद व सलाम पहुंचाने पर मुकर्रर हैं, उनके अलावा और भी बहुत से काम हैं जो फ़रिश्ते अनजाम देते रहते हैं।

उनमें चार फ़रिश्ते बहुत मशहूर हैं, अव्वल हज़रते जिबरील अलैहिस्सलाम जो अल्लाह तआला के अहकाम पैगम्बरों तक पहुंचाते थे । दूसरे हज़रते इसराफील अलैहिस्सलाम जो कियामत के दिन सूर फूकेंगे। तीसरे हज़रते

✴️ अल्लाह तआला ✴️

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला है।
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सवाल:-  अल्लाह तआला के बारे में कैसा अकीदा रखना चाहिए ❓

जवाब:- अल्लाह तआला एक है उसका कोई शरीक नहीं।

आसमान व जमीन और सारी मखलूकात का पैदा करने वाला वही है।

वही इबादत के लाइक है दूसरा कोई इबादत के लाइक नहीं है।

वही सबको रोजी देता है।

अमीरी-गरीबी और इज्जत व जिल्लत सब उसके इखतियार में है।

जिसे चाहता है इज्जत देता है और जिसे चाहता है जिल्लत देता है।

उसका हर काम हिक्मत है, बंदो की समझ में आये या न आये वह हर कमाल व खूबी वाला है।

झूट, दगा, खियानत, जुल्म जिह्ल वगैरह हर ऐब से पाक है, उसके लिए किसी ऐब का मानना कुफ्र है।


सवाल:- क्या अल्लाह तआला को बुढ़ऊ कहना जाइज़ है ❓

जवाब:- अल्लाह तआला की शान में ऐसा