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⚡ क़ब्रे अनवर में नक़ब ⚡

577 हिजरी मुल्के शाम की बात है उस वक़्त वहां के बादशाह सुल्ताने आदिल हज़रत नूर उद्दीन जंगी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि थे, एक रात आप तहज्जुद की नमाज़ पढ़कर सो रहे थे अचानक एक ही रात में 3 बार ये ख्वाब देखा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आपको 2 लोगों की सूरत दिखाकर फरमा रहे हैं कि ऐ नूर उद्दीन इन दोनों को मुझसे जुदा करो ये ख्वाब देखकर बादशाह बहुत बेचैन हुए और अपने आलिम वज़ीर जमाल उद्दीन मूसली से इसकी ताबीर पूछी तो वो फरमाते हैं कि ज़रूर मदीना तय्यबह में कोई बड़ा हादसा हुआ है या होने वाला है लिहाज़ा बिना देर किये हमें वहां पहुंचना चाहिये, बादशाह ने सिर्फ अपने खास 20 लोगों के साथ कसीर दौलत लेकर मदीना का सफर शुरू किया और 16 दिन के बाद मदीना पहुंचे, मस्जिदे नब्वी शरीफ में 2 रकात नफ्ल शुक्राना अदा की और अपने वज़ीर के ज़रिये ये ऐलान करवाया कि बादशाह यहां ज़ियारते नब्वी के लिए हाज़िर हुए हैं और तमाम लोगों को नज़राना पेश करना चाहते हैं इसलिए तमाम अहले मदीना से गुज़ारिश है कि वो आकर हदिया क़ुबूल करें, ये ऐलान सुनकर लोगों का हुजूम लग गया और सब आकर नज़राना लेते रहे और बादशाह सबको बगौर देखते रहे मगर वो 2 शक्लों वाले नहीं दिखे और तमाम लोग जा चुके थे, बादशाह ने वहां के सरदार से पूछा कि क्या अब भी कोई बचा रह गया है तो उन्होंने बताया कि यहां का रहने वाला तो कोई नहीं बचा हैं मगर 2 लोग जो कि बहुत ही मुत्तक़ी व परहेज़गार हैं हमेशा नमाज़ व अज़कार में ही लगे रहते हैं और खुद बहुत मालदार हैं कि अक्सर गरीबों की मदद करते रहते हैं वही दोनों नहीं आये हैं, बादशाह ने उन दोनों को भी तलब फरमाया जब वो दोनो आये तो बादशाह की आंखें खुली की खुली रह गई क्योंकि ये दोनों वही ख्वाब वाले शख्स थे ।

बादशाह उन दोनों को लेकर उनके कमरे तक पहुंचे जो कि रौज़-ए-अनवर से कुछ ही दूरी पर था जब अंदर जाकर देखा तो वहां दरहमो दीनार के ढेर लगे हुए थे, बादशाह ने पूछ-ताछ की मगर कोई सुराग ना मिला वो यही कहते रहे कि हमें आपके नज़राने की ज़रूरत ना थी इसलिए हाज़िर नहीं हुए, सिपाहियों ने पूरे घर का मुआयना कर लिया मगर कुछ हाथ ना लगा तब बादशाह ने ज़मीन से कालीन हटाने को कहा तो वहां एक सुरंग नज़र आयी अब बादशाह ने उन दोनों को कोड़े लगवाने शुरू कर दिए तो उन लोगों ने ये राज़ खोला कि हम रोम की ईसाई हैं और हमें यहां हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की लाश मुबारक को लाने के लिए भेजा गया था क्योंकि मुसलमानों की असली ताक़त उन्हीं से है तो हम उनके जस्दे मुबारक को ही यहां से हटा देते, हम रात भर सुरंग के ज़रिये मिटटी निकालते और सुबह वो मिटटी थैलों में भरकर जन्नतुल बक़ीअ में फेंक आते थे अब शायद एक या दो दिन का काम ही रह गया था कि हम बिलकुल रौज़-ए-अनवर तक पहुंच गए थे मगर आप आये और हमारी गिरफ्तारी हो गयी, बादशाह ने उन दोनों को क़त्ल करवा दिया और रौज़-ए-अनवर की गहरी बुनियाद खुदवाकर उसमें पिघला हुआ शीशा भरवा दिया कि आईंदा किसी नापाक के दिमाग में भी यहां नक़ब लगाने का ख्याल ना आये, और जब तक ये सारा काम होता रहा बादशाह सलामत वही खड़े रोते रहे और यही कहते रहे कि मैं अपनी किस्मत पर किस क़दर नाज़ करूं कि मेरे सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पूरी दुनिया में मुझे इस काम के लिए चुना और अपना दीदार कराया ।

📕 रूहानी हिकायत, जिल्द 2, सफह 11


दुनिया के तमाम धरम वाले ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि मुसलमानो का मरकज़ मदीना है और उनकी ताक़त हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ाते मुक़द्दसा, इसीलिए कुछ जाहिल अक्सर मुसलमानों को कमज़ोर करने के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ाते बाबरकात पर हमला करते रहते हैं मगर वो ये नहीं जानते कि इन सब बातों से मुसलमान कमज़ोर नहीं होता बल्कि अपने नबी पर जानो माल क़ुर्बान करने का उसका जज़्बा और बुलंद हो जाता है, यहां एक ऐतराज़ को दफअ करता चलूं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो मालिको मुख्तार हैं तो क्यों उन्होंने खुद अपने आप को ना बचा लिया तो इसका जवाब ये है कि बेशक वो मालिको मुख्तार हैं वो चाहें तो आन की आन में कायनात को पलट कर रख दें मगर वो खुद ऐसा करते तो किसी को पता ना चलता और वो दोनों मर खपकर कहीं पड़े रह जाते इसलिए किसी के ज़रिये उन लोगों को सज़ा दिलवाकर आईन्दा आने वाले लोगों को आगाह भी कर दिया और मुसलमानो की अज़मतो बुलन्दी का मरकज़ भी तय फरमा दिया ।

📚 हदीस शरीफ़ की मज़ाक उड़ाने का अंजाम 🔥

हदीस शरीफ़👇हज़रत अबू दरदा रज़िअल्लाहू त‌आला अन्ह से मरवी है के
रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ~

जो शख़्स इल्म ए दीन हासिल करने के लिए सफ़र करता है तो ख़ुदा ए त‌आला उसे जन्नत के रास्तों में से एक रास्ता पर चलाता है और तालिब ए इल्म की रज़ा हासिल करने के लिए फ़िरिश्ते अपने परों को बिछा देते हैं।

📗मिश्कात शरीफ़, सफ़ा 34


हज़रत मुल्ला अली क़ारी रहमातुल्लाहि तआला अलैह फ़रमाते हैं~

इस हदीस शरीफ़ में इस बात की जानिब इसारा है के जन्नत के रास्ते इल्म के रास्तों में महदूद हैं इसलिए के नेक अमल बग़ैर इल्म के मक़सूद नहीं।

📗मिरक़ात जिल्द 1, सफ़ा 229

और तहरीर फ़रमाते हैं के
अहमद बिन शुएब से रिवायत है
उन्होंने बयान किया के हमने शहर ए बशरा में इस हदीस शरीफ़ को एक मुहद्दिस से बयान किया जबके उस मजलिस में एक बदमज़हब मुअतज़ली भी बैठा हुआ था जो इल्म हासिल करने के लिए आया हुआ था उसने इस हदीस शरीफ़ का मज़ाक उड़ाते हुए कहा
कल हम जूता पहनकर चलैगे और उससे फ़िरिश्तों के परों को रौंदेंगे
जब अपने कहने के मुताबिक़ दूसरे दिन वो जूता पहनकर चला तो धड़ाम से गिर गया और उसके पैरों में मर्ज़ आक्ला पैदा हो गया जिससे उसके दोनों पैर सड़ गये।

📗मिरक़ात शरह मिश्कात, जिल्द 1, सफ़ा 229

और तिबरानी ने कहा के मैंने इब्ने
याहया साजी से सुना वो बयान करते थे के हम एक मुहद्दिस के यहां जाने के लिए बशरा शहर की गलियों में से

💫 अंजीर-Fig 💫

अंजीर बुनियादी तौर पर मशरिके वुस्ता और एशियाई कोचक का फल है अगर चे अब ये हिंदुस्तान में भी पाया जाता है मगर मुसलमानों की हिंदुस्तान में आमद से पहले इसका कोई सुराग नहीं मिलता, इसलिए यही सही है कि इसे मुसलमान ही हिंदुस्तान लेकर आये और इसकी काश्त की मगर 1000 साल गुज़र जाने के बाद भी आज इसकी काश्त इस तौर पर नहीं की जाती कि वो तमाम लोगों की ज़रूरत को पूरा कर सके लिहाज़ा तुर्की, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, ईरान, फिलिस्तीन, शाम और लेबनान से इसे मंगाया जाता है, कहते हैं फलों में ये सबसे नाज़ुक फल है कि पकने के बाद खुद ही पेड़ से गिर जाता है और दूसरे दिन तक इसे महफूज़ रखना मुश्किल हो जाता है सो इसे सुखाकर ही इस्तेमाल लायक बनाया जाता है, इसके फज़ायल के लिए इतना ही काफी है कि क़ुर्आन में अल्लाह तबारक व तआला इसकी कसम याद फरमाता है, इरशाद फरमाया ~
 
कंज़ुल ईमान - कसम अंजीर और ज़ैतून की

📕 पारा 30, सूरह वत्तीन, आयत 1


तफसीर - अंजीर एक उम्दा मेवा है जिसमे फुज़्ला नहीं है बहुत तेज़ हज़म होने वाला जिगर और मेदे की इस्लाह करने वाला बलगम को निकालने वाला और कमज़ोर जिस्म को फरबा करने वाला है ।

📕 खज़ाएनुल इरफान, सफह 709


हदीस - हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में अंजीर से भरा हुआ एक तश्त आया तो आप फरमाते हैं कि अगर कोई कहे कि क्या जन्नत से फल ज़मीन पर आ सकता है तो मैं कहूंगा यही है वो, तो इसे खाओ कि अंजीर बवासीर को खत्म कर देता है और गठिया यानि जोड़ों के दर्द में मुफीद है।

तिब - इसके अलावा ये गुर्दे और पित्त से पथरी को तोड़कर निकाल देने में कारगर है मगर बासी मुंह 6 दाने के

💫 अक़ायद 💫 क्या किसी काफिर को काफिर नहीं कहना चाहिये ??

✳️ क्या किसी काफिर को काफिर नहीं कहना चाहिये आईये क़ुर्आन से ही पूछ लेते हैं, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फरमाता है ~

कंज़ुल ईमान - तुम फरमाओ ऐ काफिरों !

📕 पारा 30, सूरह काफिरून, आयत 1


कंज़ुल ईमान - बेशक ज़रूर उन्होंने कुफ्र की बात कही और इस्लाम में आकर काफिर हो गये ।

📕 पारा 10, सूरह तौबा, 74


कंज़ुल ईमान - बहाने ना बनाओ तुम काफिर हो चुके मुसलमान होकर।

📕 पारा 10, सूरह तौबा, आयत- 66


मगर आज कुछ बेवकूफ लोग हमसे ये कहते नज़र आते हैं कि किसी काफिर को काफिर ना कहना चाहिये कि पता नहीं वो कब मुसलमान हो जाये, ऐसा ऐतराज़ करने वाला बड़ा जाहिल है क्योंकि अगर काफिर को काफिर ना कहने की यही दलील है तब तो किसी मुसलमान को भी मुसलमान ना कहना चाहिये पता नहीं कि वो कब काफिर हो जाये माज़ अल्लाह,

आखिर वहाबी मुसलमान के घर पैदा होकर भी काफिर हो ही रहा है, और फिर देखिये कि रब क़ुर्आन मुक़द्दस में काफिर को तो काफिर कह ही रहा है मगर उन लोगों को भी काफिर कह रहा है जिन्हे खुद मुसलमान कहा यानि मुसलमान तब ही तक मुसलमान कहलायेगा जब तक कि ईमान पर क़ायम हो और जिस दिन वो ईमान से फिरा तो काफिर ही कहलायेगा, पर आज कुछ लोगों ने ईमान को अपने बाप की जायदाद समझ लिया है कि चाहे माज़ अल्लाह खुदा व रसूल और उसके वलियों की शान में लाख गुस्ताखी करो मगर जायदाद की तरह अपना ईमान कहीं जा नहीं रहा है कि वो तो बाप की जागीर है उसे तो हासिल कर ही लेंगे, ऐसे लोगों के लिए क़ुर्आन की कुछ आयतें पेश करता हूं, मौला तआला इरशाद फरमाता है-

कंज़ुल ईमान - क्या लोग इस घमण्ड में हैं कि इतना कह लेने पर छोड़ दिये जायेंगे कि हम ईमान लाये और उनकी आज़माईश ना होगी ।

📕 पारा 20, सूरह अन्कबूत, आयत 1


कंज़ुल ईमान - जो कुछ आमाल उन्होंने किये हमने सब बरबाद कर दिये।

📕 पारा 19, सूरह फुरक़ान, आयत 23


कंज़ुल ईमान - अमल करें मशक़्क़त झेलें और बदला क्या होगा ये कि भड़कती आग में बैठेंगे ।

📕 पारा 30, सूरह ग़ाशिआ, आयत 3-4


अमल करें मशक्क़त झेलें यानि रात-रात भर जागकर नमाज़ पढ़ें, दिन को भूखा प्यासा रहकर रोज़ा रखें,

आला हज़रत

कुछ गैरों ने पूछा तुम लोग आलाहज़रत को इतना क्यों मानते हो -?
तो कहा : कान खोल के सुनो ________

इस दुनियां में बहुत कलमगार आये ,

किसी ने कलम उठाया लैला का ज़िक्र किया ,

किसी ने कलम उठाया मजनूं का ज़िक्र किया ,

किसी ने क़लम उठाया शीरी का ज़िक्र किया ,

किसी ने क़लम उठाया फरहाद का ज़िक्र किया ,

लेकिन आला हज़रत ने जब , जब क़लम उठाया किसी दुनियादार का नहीं बल्कि मदीने के ताजदार ﷺ  के बारे में ज़िक्र किया।

आप देखो तो सही क्या खूब फ़रमाते हैं आला हज़रत :
👇🏽

उन्हें जाना , उन्हें माना , न रखा गैर से काम , लिल्लाहिल हम्द मैं दुनिया से मुसलमान गया ।


क़लम उठा आला हज़रत का तो  नबी ﷺ की पेशानी  के बारे में लिखा :

जिस के माथे शफ़ाअत का सेहरा रहा, उस ज़बीने सआदत पे लाखों सलाम ।


क़लम उठा आला हज़रत का तो नबी ﷺ के  गोशे मुबारक  के बारे में लिखा :

दूरो नज़दीक के सुनने वाले वो कान , काने लाले करामत पे लाखों सलाम.


क़लम उठा आला हज़रत का लबे मुस्तफ़ा ﷺ  के बारे में लिखा :

पतली पतली गुले क़ुदस की पत्तियां , उन लबों की नज़ाक़त पे लाखों सलाम .


जब क़लम उठा आला हज़रत का  आमदे हुज़ूर ﷺ के बारे में लिखा :

जिस सुहानी घड़ी चमका तैबा का चाँद उस दिल अफरोज साअत पे लाखों सलाम.


क़लम उठा आला हज़रत का शहरे रसूल ﷺ  के बारे में लिखा :

हरम की ज़मीं और क़दम रख के चलना अरे सर का मौक़ा है ओ जाने बाले .


क़लम उठा आला हज़रत का  नबी की हयात ﷺ  के बारे में लिखा :

तू ज़िन्दा है वल्लाह , तू ज़िंदा है वल्लाह मेरे चश्मे आलम से छुप जाने बाले.


क़लम उठा  आला हज़रत का तो  अताये रसूल ﷺ  के बारे में लिखा :

मेरे करीम से गर , क़तरा किसी ने माँगा, दरिया वहा दिए हैं दुरबे बहा दिए हैं..