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तकबीरे तहरीमा के वक़्त सर को कैसे रखना चाहिए

मस्अला:- तकबीरे तहरीमा के वक़्त सर न झुकाना बल्कि सीधा रखना सुन्नत है।

#(बहारे शरीअत)
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तकबीर कहने से पहले हाथ को उठाना

मस्अला:- दोनों हाथों को तकबीर कहने से पहले उठाना सुन्नत है।
#(बहारे शरीअत)
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तकबीरे-तहरीमा कहते वक्त हथेलियों का रुख किधर होना चाहिये

मस्अला:- तकबीरे-तहरीमा कहते वक्त हथेलियों और ऊंगलियों के पेट किब्ला रु होना सुन्नत है।

#(बहारे शरीअत)
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तकबीरे-तहरीमा में हाथ कैसे रखना चाहिये

मस्अला:- तकबीरे-तहरीमा में हाथ उठाते वक्त ऊंगलियों को अपने हाल पर छोड़ देना चाहिये या'नी ऊंगलियों को बिल्कुल मिलाना भी न चाहिये और ब:तकल्लुफ (तकलीफ उठाकर-Inconvenient) कुशादा (खुली-Opened) भी न रखना चाहिये और येह सुन्नत तरीका है।

#(बहारे शरीअत)
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तकबीरे तहरीमा में हाथ उठाना

मस्अला:- तकबीरे तहरीमा के लिये दोनों हाथों को कानों तक उठाना सुन्नत है।

#(बहारे शरीअत)
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तकबीरे-तहरीमा कहना वाजिब

मस्अला:- तकबीरे-तहरीमा में अल्लाहो अकबर का जुमला (वाक्य) कहना वाजिब है।

#(बहारे शरीअत)
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पहली रकअत का रुकूअ मिल गया तो....

मस्अला:- पहली रकअत का रुकूअ मिल गया तो तकबीरे-उला या'नी तकबीरे-तहरीमा की फजीलत मिल गई।

#(आलमगीरी; बहारे शरीअत)
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गूंगे शख्स के लिए तकबीरे-तहरीमा का हुक्म

मस्अला:- जो शख्स तकबीर के तलफ्फुज़ पर कादिर न हो, मस्लन गूंगा (मूंगा-Dumb) हो या किसी वजह से जुबान बंध हो गई हो, उस पर तलफ्फुज या'नी मुंह से बोलना वाजिब नहीं। दिल में इरादा काफी है, या'नी दिल में कह ले।

#(दुर्रे मुख़्तार)
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नफ़्ल नमाज़ में तकबीरे-तहरीमा का हुक्म

मस्अला:- नफ्ल नमाज़ के लिये तकबीरे-तहरीमा रुकूअ में कही तो नमाज़ न हुई और अगर बैठ कर कही तो हो गई।

#(रद्दुल मोहतार)
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झुकने की हालत में तकबीरे-तहरीमा पर नमाज़ का हुक्म


मस्अला:-  बा'ज़ (कुछ) लोग इमाम को रुकूअ में पा लेने की गरज से जल्दी-जल्दी रुकूअ में जाते हुए तकबीरे-तहरीमा कहते हैं और ज़कने की हालत में तकबीरे-तहरीमा कहते हैं, उनकी नमाज़ नहीं होती।

उनको अपनी नमाज़ फिर से दोबारा पढ़नी चाहिये।

#(फतावा रिज़वीया, जिल्द-3, सफ़ा-393)
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इमाम रुकू में हो तो मुक़तदी तकबीरे-तहरीमा कैसे कहे

मस्अला:- इमाम को रुकूअ में पाया और मुक़तदी तकबीरे तहरीमा कहता हुआ रुकूअ में गया और तकबीरे-तहरीमा उस वक्त ख़त्म की कि अगर हाथ बढ़ाए (लम्बा करे) तो घुटने तक पहुँच जाए, तो उसकी नमाज़ न हुई।

#(रद्दुल मोहतार)
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किस नमाज़ में बैठ के, किस नमाज़ में खड़े होकर तकबीरे-तहरीमा कहना चाहिए

मस्अला:- जिन नमाज़ों में कयाम (खड़ा होना) फर्ज़ है, उनमें तकबीरे-तहरीमा के, लिये भी कयाम फर्ज है।

अगर किसी ने बैठकर 'अल्लाहो अकबर' कहा, फिर खड़ा हो गया, तो उसकी नमाज़ शुरु ही न हुई।

#(दुर्रे मुख़्तार; आलमगीरी)
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बेवजह नमाज़ की निय्यत तोड़ना

मस्अला:- बे सबब (बिना कारण) निय्यत तौड़ देना या'नी नमाज़ शुरू करने के बाद बिला शरई वजह से नमाज़ तोड़ देना हराम है।
#(फतावा रिज़वीया जिल्द-3, सफ़ा-414)
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नमाज़ में अज़ान का जवाब देने का हुक्म

मस्अला:- कोई शख्स नमाज़ पढ़ रहा था और का'दा की हालत में अत्तहिय्यात पढ़ रहा था। जब 'कल्म-ए-तशह्हुद' के करीब पहुंचा, तब मोअज्जिन ने अज़ान में 'शहादतैन' (दो शहादतें) कहीं, उस नमाजी ने 'अत्तहिय्यात' की किरअत के बजाए (बदले) अज़ान का जवाब देने की निय्यत से 'अश्हदो-अल-ला-इलाहा-इल्लल्लाहो-व-अशहदो-अन्ना-मुहम्मदन-अब्दोहु-व-रसूलोहु' कहा, तो उसकी नमाज़ फासिद हो गई।

#(फतावा रिज़वीया जिल्द-3 सफ़ा-406)
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नमाज़ में "सदकल्लाहो-व-सदका रसूलोहु" कहना

मस्अला:- मुक्तदी ने इमाम की किरअत सुनकर "सदकल्लाहो-व-सदका रसूलोहु'' कहा, तो नमाज़ फासिद हो गई।
#(दुर्रे मुख़्तार; रद्दुल मोहतार)
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वो मुक्तदी जिसकी कुछ रकअतें छूट गयी, वो बाकी नमाज़ कैसे अदा करे

मस्अला:- मस्बूक या'नी वोह मुक्तदी जो जमाअत में शामिल हुआ मगर उस की एक या ज्यादा रकअतें छूट गई हैं, वोह मुक्तदी इमाम के सलाम फैरने के बाद अपनी फौत शुदा (छुटी हुई) रकअतें पढ़ेगा।

उस मस्बूक मुक्तदी ने येह खयाल कर के कि इमाम के साथ सलाम फैरना चाहिये, और उसने इमाम के साथ सलाम फैर दिया, तो उसकी नमाज़ फासिद हो गई।

#(आलमगीरी; बहारे शरीअत हिस्सा-3 सफ़ा-149)
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नमाज़ में तस्बीहात को ज़बान से गिनना

मस्अला:- हालते नमाज़ में आयतों, सूरतों और तस्बीहात को ज़बान से गिनना (गिनती करना-Countings) मुफसिदे नमाज़ है।

#(बहारे शरीअत हिस्सा-3 सफ़ा-171)
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बेहोश हो जाने पर नमाज़ का हुक्म

मस्अला:- बेहोश (बेभान-Unconcious) हो जाने से या वुजू या गुस्ल टूट जाने से नमाज़ फासिद हो जाती है।

#(बहारे शरीअत)
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नमाज़ में ऐसी दुआ करना कि जिसका सवाल बंदे से भी किया जा सकता है

मस्अला:- नमाज़ में ऐसी दुआ करना कि जिसका सवाल बंदे से भी किया जा सकता है, मुफसिदे-नमाज़ है।

मस्लन येह दुआ की कि- 'अल्लाहुम्मा-अत्इमनी' या'नी ए अल्लाह ! मुजे खाना खिला', या 'अल्लाहुम्मा-ज़व्विजनी' या'नी ए अल्लाह ! मेरा निकाह करा दे, तो नमाज़ फासिद हो जाएगी।

#(आलमगीरी; बहारे-शरीअत हिस्सा-3, सफ़ा-151)
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सज्दा करने की जगह पाँव रखने की जगह से ऊंची होने पर नमाज़ का हुक्म

मस्अला:- अगर सजदा की जगह पांव की जगह से चार गिरह से ज़यादा उंची हो तो सिरे से (प्रारम्भ-Origin) नमाज़ ही नहीं होगी और अगर चार (4) गिरह या कम (Less) बुलन्दी मुम्ताज़ (विशिष्ट-Eminent) हुई, तो नमाज़ कराहत से खाली नहीं।

या'नी पांव रखने की जगह से सजदा करने की जगह एक (1) बालिश्त (बेंत/Span) भर उंची हो, तो नमाज ही नहीं होगी।

#(दुर्रे मुख्तार; फतावा रिज़वीया जिल्द-3 सफ़ा-42/438)


नोट :-

◆एक गिरह = तीन (3) ऊंगल चौड़ाई (Wide)