ईदे मीलादुन्नबी पर मुसलमानाने अहले सुन्नत से दो बातें

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माहे रबीउल अव्वल की बारह तारीख़ को हमारे प्यारे आक़ाﷺ इस दुनिया में तश्ररीफ़ लाये और दुनिया भर के मुसलमान क़दीम ज़माने से आप की विलादत की ख़ुशी मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से मनाते चले आये हैं। माहे रबीउल अव्वल की बारहवीं तारीख़ जश्न मनाना, एक दूसरे को मुबारकबाद देना, चराग़ां करना वगैरा खैर व बरकत के काम हैं उनकी अस्ल कुरआन व हदीस से साबित है। इन बातों की मुखालफ़त करने वाला यक़ीनन राहे हक़ से भटका हुआ है।

लेकिन मौजूदा दौर में ईद मीलादुन्नबीﷺ के मौके पर लोग हद से बढ़ चुके हैं। जुलूसों में डी.जे. और ढोल जैसी आवाज़ों वाली नातें पढ़ी जाती हैं, उन की धुनों पर नौजवान डांस करते, कूदते-थिरकते हैं। कहीं छतों से खाने पीने का सामान फेंक कर रिज़्क़ की बेहुरमती की जाती है। गुम्बदे ख़ज़रा वगैरा के मुजस्समे तो जाने दीजिये अब तो ऐसी चीज़ों के मुजस्समे बनाकर घुमाये जाने लगे हैं जिनका इस्लाम से कोईतअल्लुक़ नहीं।

खुलासा यह कि अब इसमें बहुत सारीगैर शरईबातें दाखिल हो गयीं हैं। ज़रूरत इस बात की है कि हम सब मिलकर इन के ख़ातमे की कोशिश करें और जहां तक हो सके सादगी, अदब व एहतराम के साथ, शरीअत के

ईदे मीलादुन्नबी के मुबारक मौके परः-

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    क्या करें ?   

☑️ नातिया महफ़िलें मुनअकिद करें जिसमें हुज़ूरﷺ के फ़ज़ाइल व मनाकिब बयान किये जायें।

☑️ अपने घर मुहल्ले, कूचे व बाजार को सजायें और झण्डे लगायें।

☑️ एक दूसरे को मुबारकबाद दें और दोस्तों को इत्र व दीगर तोहफ़ों से नवाजें। रोज़ा रखें जैसा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुद पीर शरीफ़ के दिन रोज़ा रखा करते थे।

☑️ निहायत अदब व ऐहतराम सुकून व विक़ार के साथ जुलूसे मुहम्मदी में शिरकत करें।

☑️ इस्लामी बुक स्टाल लगायें, और इस्लामी किताबें बिला कीमत या कम कीमत पर तक़सीम करें।

☑️ अपने घरों में चरागां करें और बच्चों को ईदी तक़सीम करें।

☑️ इस दिन कसरत से दुरूदे पाक का विर्द करें।

☑️ सुबह सादिक के वक़्त हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इस्तक़बाल में नज़रानये दुरूदो सलाम पेश करें और फ़ातेहा ख्वानी करें।

☑️ जुलूस के दरमियान नमाज़ का वक्त आने पर नमाज़ पहले अदा करें।


     क्या न करें?    

❎ मीलादुन्नबी के मौके पर खुशी में कोई भी गैर शरई काम हरगिज़ न करें जैसे आतिशबाज़ी, ढोल ताशा वगैरह।

❎ गानों की तर्ज पर नाते न पढ़ें न सुनें न कैसेट वगैरह में बजायें।

❎ खाने पीने की अशिया को हाथों में अदब के साथ दें। लुटाकर बर्बाद न करें कि रिज़्क की बेअदबी अल्लाह को

-: फ़रमाने रसूलल्लाह ﷺ :-

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1). मेरी बातें लोगो तक पहुंचाओ, चाहे एक ही आयत हो।

2). पाकी आधा ईमान है।

3). जन्नत की चाबी नमाज़ है और नमाज़ की चाबी वुजू।

4). एक दौर ऐसा आयेगा कि लोग मस्जिद में बैठकर दुनिया की बातें करेगें अगर तुम ऐसा दौर पाओ तो उनके पास न बैठना।

5). भूखों को खाना खिलाओ, मरीज़ को देखने जाओ और कैदी को कैद से छुड़ाओ।

6). जुमा की नमाज़ के लिये कोई भी शख्स अपने भाई को उठाकर उसकी जगह न बैठे।

7). मोमिन को मौत इस तरह आ जाती है जिस तरह माथे पर पसीना।

8). जिन्दगी में एक दिरहम सदका करना मरते वक्त सौ दिरहम सदक करने से बेहतर है।

9). तीन दुआओं के क़बूल होने में कोई शक नहीं (1) बाप की दुआ औलाद के लिये, (2) मुसाफिर की दुआ, (3) उसकी दुआ जिस पर जुल्म किया जाये।

10). जन्नत में मक्कार, कंजूस और एहसान जताने वाले न जायेंगे।

11). मज़दूर को उसका पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी दे दिया करो।

12). शैतान उस खाने को अपने लिये हलाल समझता है जिस पर अल्लाह का नाम नहीं लिया जाता।

13). अल्लाह तआला छींक को पसन्द फ़रमाता है और जमाही को नापसन्द फरमाता है।

14). वह मोमिन नहीं जो अपना पेट भरे और उसका पड़ोसी भूखा हो।

15). दुनिया मोमिन के लिये कैदखाना है।

16). मैने जन्नत में झांका तो उसमें ज़्यादातर गरीबो को देखा और मैंने दोज़ख़ में झांका तो ज़्यादातर

हुज़ूरﷺ की पूरी ज़िन्दगी एक नज़र में

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आपका नाम-- मोहम्मदﷺ

वालिद का नाम-- हज़रत अब्दुल्लाह

वालिदा का नाम-- हज़रत आमिना

दादा का नाम-- हज़रत अब्दुल मुत्तलिब

नाना का नाम-- वहब

विलादत (पैदाइश)-- 12 रबीउल अव्वल, 20 अप्रैल सन् 571 ई0, दिन पीर सुबह सादिक के वक्त

वालिदा की वफात-- 06 साल की उम्र में

मुल्केशाम (सीरिया) का पहला सफर-- 12 साल की उम्र में

मुल्केशाम (सीरिया) का दूसरा सफर-- 25 साल की उम्र में

वही की शुरूआत-- 40 साल की उम्र में

आम एलान-- 44 साल की उम्र में

चाचा अबु तालिब का इन्तकाल-- 50 साल की उम्र में सन् 10 नबवी

हज़रत ख़दीजा का विसाल-- 50 साल की उम्र में सन् 10 नबवी

मदीना को हिजरत-- 53 साल की उम्र में सन् 13 नबवी

मस्जिदें नबवी का संगे बुनियाद-- 55 साल की उम्र में सन् 01 हिजरी

हुज़ूरﷺ के मोजिज़े

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अल्लाह तआला ने अपने सभी नबियों व रसूलों को मोजिज़े (वह ख़िलाफ़े आदत काम जो नबी से जाहिर हो) अता फरमायें लेकिन सबसे ज्यादा जाहिर और रोशन मोजिज़े हमारे नबीﷺ को अता किये। उन में से कुछ मोजिज़े पेश किये जाते हैं-

▫️एक बार मक्का के मुश्रिकों ने आप से चाँद के दो टुकड़े करने को कहा, आपने फरमाया कि अगर मैं ऐसा कर दूं तो तुम ईमान ले आओगे? उन्होने इकरार कर लिया। हुज़ूरﷺ ने इशारा फरमाया, चाँद के दो टुकड़े हो गये एक टुकड़ा पहाड़ के एक तरफ और दूसरा पहाड़ के दामन में आ गया।

▪️एक आराबी (अरब के देहाती) को आपने इस्लाम पेश किया, उसने निशानी तलब की आपने फरमाया कि अगर मैं उस खजूर के गुच्छे को बुला लूं तो तुम मुसलमान हो जाओगे? उसने इकरार कर लिया, आपने उस गुच्छे को बुलाया तो वह पेड़ से उतरने लगा और जमीन पर गिर पड़ा फिर उछलते हुये, आपकी बारगाह में हाजिर हो गया। आपने उसको इशारा किया वह फिर अपनी जगह लौट गया। यह देखकर वह फौरन मुसलमान हो गया।

▫️एक सहाबी हज़रत क़तादा की आँख जंग में ज़ख़्मी हो गयी और बाहर निकल आयी। वह आपकी बारगाह में हाज़िर हुये। आपने आँख का ढेला पकड़ कर उसकी जगह रख दिया, वह आँख बिल्कुल सही हो गयी, बल्कि

हुज़ूरﷺ का रहम व करम

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हुज़ूरﷺ की पूरी ज़िन्दगी रहम व करम और अमन पसन्दी की आईनादार है। एक मर्तबा आप से अर्ज़ किया गया कि मुशरिकों की हलाकत की दुआ फरमा दें। आप ने फरमाया "मैं लानत करने और हलाकत के लिये नहीं भेजा गया हूँ बल्कि मैं तो सरापा रहमत बनाकर भेजा गया हूँ"।

जब आप लोगों को नमाज़ पढ़ाते और नमाज़ के दौरान किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ जाती तो आप नमाज़ को मुख़्तसर (छोटा) फरमा देते कि बच्चे की माँ परेशान न हो जाये।

मक्का फतह होने का वाक़या किसे याद न होगा। हिजरत से पहले मक्का के काफिरों ने आपको हर तरह से सताने की कोशिश की आप पर कूड़ा करकट फैंका, रास्ते में कांटे विछाये, जुल्म व सितम करने में कोई कसर न छोड़ी लेकिन सन 8 हिजरी में जब मक्का फतह हुआ तो आप ने अपने सख्त से सख्त दुश्मन को बुलवाया और फरमाया "बताओ मैं तुम्हारे साथ क्या सुलूक करूँ?" जवाव मिला कि हम आपसे रहम की उम्मीद करते है। आपने फरमाया "जाओ तुम को आज़ाद किया जाता है आज तुम पर कोई इल्ज़ाम नही"।

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🖌️पोस्ट क्रेडिट ~ शाकिर अली बरेलवी रज़वी  व अह्-लिया मोहतरमा

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हुज़ूरﷺ की अख़लाक़ व आदतें

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मुस्तफ़ा जाने रहमतﷺ को अल्लाह तआला ने हर तरह की खूबियों से नवाज़ा और हर खूबी सारे इन्सानों से बढ़कर अता की, इस लिये आपका अखलाक (व्यवहार)भी सबसे बेहतर कि अल्लाह तआला ने खुद आपके अच्छे अख़लाक की तारीफ की जैसा कि फरमाया "बेशक आप बुलन्द अखलाक़ पर हैं।" बल्कि अगर यह कहा जाये कि अरब के लोग आपके मोजिज़ों से ज्यादा आपके अख़लाक़ से मुतअस्सिर (प्रभावित) हुये तो गलत न होगा। यही वजह है कि आपके बुलन्द अख़लाक़ को देखकर ही न जाने कितनों को ईमान की दौलत नसीब हो गयी।

हुज़ूरﷺ बच्चों के पास गुज़रते तो उन्हें भी सलाम करते, सलाम में हमेशा पहल फरमाते, हर अच्छे काम की शुरूआत सीधे हाथ से फरमाते, बात करते तो साफ-साफ ठहर-ठहर कर तीन बार दोहराते कि हर शख्स अच्छी तरह समझ लेता, ज्यादा तर मुस्कुराते रहते यानि सिर्फ दाँत मुबारक ज़ाहिर होते पूरी ताकत से कभी न हँसे, खाने से पहले और बाद में हाथ मुबारक धोते लेकिन खाने से पहले धोकर पोछते न थे, गुस्से की हालत में चेहरे मुबारक फेर लेते, अपने काम खुद कर लिया करते बल्कि दूसरों के भी काम फरमा देते, आराम फरमाते तो दाहिनी करबट के बल सीधा हाथ ख़्सार (गाल) मुबारक के नीचे रख लेते, मजलिस में जहाँ जगह मिल जाती वहीं तशरीफ फरमा हो जाते, चलते तो ऐसा लगता जैसे ढलवान से उतर रहे, खुश्बू खूब इस्तेमाल फरमाते, दूध

हुज़ूरﷺ हुलिया शरीफ

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आपका जिस्म चमकता, दमकता, महकता। रंग बहुत ही साफ ऐसा लगता जैसे आप चांदी से बनाये गये हैं। एक सहाबी फरमाते हैं कि मैने हर तरह के रेशम देखे लेकिन जो नरमी और नफासत आपके हाथ पाक में देखी वह कहीं नज़र न आयी।

चेहरा ऐसे चमकता जैसे चौहदवीं का चाँद। जिस्म शरीफ का साया न था। जब सूरज के सामने खड़े होते तो आपके चेहरे की चमक के आगे सूरज की चमक फीकी पड़ जाती।

पेशानी कुशादा और चमकदार, आँखे बहुत खूबसूरत ऐसा लगता जैसे सुर्मा लगाये हुये हैं जबकि आप सुर्मा लगाये हुये न होते। आगे, पीछे, दायें, बायें, ऊपर, नीचे हर तरफ एक सा देखते। नज़रें हमेश झुकी झुकी रहतीं, अबरू लम्बी-लम्बी पहली के चाँद की तरह बारीक। पलके मुबारक लम्बी, रूख़्सार मुबारक भरे हुये, नाक मुबारक ऊँची, दाँत मुबारक बहुत ही चमकदार मोती की तरह, मुस्कुरादें तो रोशनी हो जाये, दाढ़ी मुबारक घनी, गेसू मुबारक लम्बे और घने कभी कानों के नर्म हिस्से तक होते कभी कंधों को चूम लेते।

दोनों कंधो के बीच सुराही दार गर्दन और उसके पीछे नबुव्वत की मोहर, सीना मुबारक चौड़ा, हाथ मुबारक

हुज़ूरﷺ का विसाल

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सन् 11 हिजरी में सफर महीने के आखिरी दिनों में आपकी अलालत की शुरूआत हुई, आपने हज़रत अबू बकर को नमाज़ पढ़ाने हुक्म दिया। हज़रत अबू बकर ने आपके हुक्म के मुताबिक़ नमाजें पढ़ाई।

12 रबीउल अव्वल पीर के दिन फज्र की नमाज के वक़्त आपकी तबीयत कुछ ठीक हुई तो आपने अपने हुजरे से पर्दा हटाकर देखा कि हज़रत अबू बकर नमाज़ पढ़ा रहे है। सबको नमाज़ पढ़ते देखकर खुशी की वजह से आप मुस्कुराने लगे। मुसलमानों की भी खुशी का कोई ठिकाना न रहा, हज़रत अबू बकर ने चाहा कि अपनी जगह से हट जायें लेकिन आप ने इशारा फरमाया कि अपनी जगह पर रहें और नमाज़ पूरी करें और आपने पर्दा गिरा दिया, इसी दिन आपका विसाल हो गया।

विसाल के बाद आपके हुक्म के मुताबिक़ आपके ख़ानदान वालों ने गुस्ल दिया और बगैर जमात के नमाज़ अदा की गयी क्योंकि आप तो अपनी ज़िन्दगी और वफात दोनो में सबके इमाम हैं। जिस जगह पर आपका विसाल हुआ उसी जगह पर बुद्ध की रात सहरी के वक्त आपकी तदफीन की गयी, कब्रे मुबारक के अन्दर आपके होठों पर यह अलफाज थे “ऐ अल्लाह! मेरी उम्मत! मेरी उम्मत !" यानी मेरी उम्मत की बख्शिश फरमा।

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मस्जिदे नबवी की तामीर

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हज़रत अबू अय्यूब के घर में ठहरने के बाद आपने सोचा कि मदीने में एक मस्जिद की तामीर होनी चाहिये, इसके लिये आपने बनू नज्जार के एक बगीचे की ज़मीन पसन्द की और तामीर शुरू हो गयी।

मस्जिदे नबवी की तामीर के बाद हुज़ूरﷺ ने अपने बाकी घर वालों को भी मदीने बुलवा लिया और उनके साथ मदीना शरीफ में ही रहने लगे।

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हुज़ूरﷺ की मदीना में जलवागरी

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मदीना वालों को आपके आने की ख़बर पहले ही मिल चुकी थी यह लोग आपके आने का बड़ी बेसब्री से इन्तेज़ार कर रहे थे। रोजाना ऊँची जगह पर चढ़कर आपका रास्ता देखते। यहां तक कि हुज़ूरﷺ तशरीफ ले आये। सबने एक साथ तकबीर का नारा लगाया और आपके इस्तिकबाल (स्वागत) के लिये निकल पड़े। हर तरफ खुशी का समां था। मदीने की औरतें और बच्चे छतों पर चढ़कर इस नूरानी काफिले को देख रहे थे और मदीने की बच्चियां खुशी में शेर गुनगुना रही थीं।

मदीने में हर एक यही चाहता था कि हुज़ूरﷺ हमारे घर कयाम करें, यह हालत देखकर आपने फरमाया कि मेरी ऊँटनी की मुहार छोड़ दो उसे अल्लाह की तरफ से हुक्म मिल चुका है। ऊँटनी चलते-चलते वहां रूक गयी जहां आज मस्जिदे नबवी है, उसके सामने हज़रत अबु अय्यूब जो अंसारी का मकान था।

उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा उन्होनें आपका सारा सामान उतरवाया और आपको अपने घर ले आये उन्होने बहुत ही अदब व एहतराम के साथ आपकी मेज़बानी की। हज़रत अय्यूब के घर हुज़ूरﷺ ने सात महीने

हुज़ूरﷺ की हिजरत

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हुज़ूरﷺ की इजाज़त के बाद तमाम मुसलमान मदीना पहुँच गये सिर्फ वही लोग पीछे रह गये जिन्हें मक्का के काफिरों ने रोक लिया था या जो लोग जाने की ताकत नहीं रखते थे।

हुज़ूरﷺ तमाम मुसलमानों को रूख़्सत फरमाते रहें और खुद मक्के में ही रहे। कुरैश को अब लगा कि कहीं हुज़ूरﷺ भी मदीना न चले जायें और इसका अन्जाम उन्हें अच्छी तरह मालूम था इसलिये उन्होने जमा होकर आपके कत्ल की स्कीम बनाई।

इधर सरकारﷺ को अल्लाह तआला ने हिजरत का हुक्म दे दिया। रात को हुज़ूरﷺ ने अपने बिस्तर पर हज़रत अली को लिटा दिया और घर से बाहर आ गये। एक मुट्ठी मिट्टी ली और कुरआन की कुछ आयतें पढ़कर काफिरों की तरफ फेंक दी। किसी को पता भी न चला और हुज़ूरﷺ उनके बीच से