पार्ट - 27 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 सिलसिलाए वाकेआत 🕋

लाइलाहा इल्लल्लाह देख रहे हैं आप?
इस एक वाकिआ के साथ कितने मुश्रेकाना अकीदे लिपटे हुए हैं।

पहला अकीदा तो मौलवी क़ासिम साहेब नानौतवी के हक़ में इल्मे ग़ैब का है क्यों कि इन हज़रात के तई अगर उन्हें इल्मे ग़ैब नहीं था तो आलमे बर्ज़ख में उन्हें क्यों कर ख़बर हो गई कि मदरसा देवबन्द में मुदर्रेसीन के दरमियान सख़्त ह॔गामा हो गया है यहा तक कि मदरसा के सदर मुदर्रिस मौलवी महमूदुल हसन साहेब भी उसमें शमील होगए हैं चल कर उन्हें मना कर दिया जाए।

और फिर उनकी रुह की कव्वते तसर्रुफ़ का क्या कहना यानी साहेब के इर्शाद के मुताबिक इस जहाने ख़ाकी में दोबारा आने के लिए उसने खुद ही आग पानी और हवा मिट्टी का एक इन्सानी जिस्म तैयार किया और खुद ही उसमें दाखिल होकर ज़िन्दगी के आसार और नक़ल व हर्कत की कुव्वते इरादी से मुसल्लह हुई और

पार्ट - 26 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 सिलसिलाए वाकेआत 🕋

मौलाना- ननौतवी साहेब का खुदाई तसर्रुफ़:-

अब एक नया तमाशा और मुलाहेज़ा फरमाईये। कारी तैय्यब साहेब की इस रवायत पर देवभन्दी मज़हब के पेशवा मौलवी अशरफ़ अली साहेब थानवी ने अपना एक नया हाशिया चढ़ाया है जिस में ब्यान करदा वाकेआ की तौसीक़ ( पुष्टि) करते हुए मौसूफ़ ने तहरीर किया है:-

यह वाकिआ रुह का तमस्सुल था और इस की दो सूरते हो सकती हैं। एक यह कि जसद मिसाली था मगर मुशाबा जसदे उंसुरी के। दूसरी सूरत यह कि रुह ने खुद उनासिर में तसर्रुफ़ करके जसदे उंसूरी तैयार

पार्ट - 25 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 सिलसिलाए वाकेआत 🕋

वफ़ात के बाद मौलवी क़ासिम नानौतवी का जिस्मे ज़ाहेरी के साथ मदरसाए देवबन्द में आना......

(इसी दौरान एक दिन अलस्सबाह बाद नमाज़े फ़ज्र मौलाना रफीउद्दीन साहेब रहमतुल्लाह अलैहि ने मौलाना महमूदुल हसन साहेब को अपने हुजरे में बुलाया ( जो दारुल उलूम देवबन्द में है ) मौलाना हाज़िर हुए और बन्द हुजरा के केवाङ खोल कर अन्दर दाख़िल हुए मौसम सख़्त सर्दी का था।

मौलाना रफीउद्दीन साहेब रहमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया कि पहले यह मेरा रुई का लेबादा देख लो। मौलाना ने लेबादा देखा तो तर था और खूब भीग रहा था फरमाया कि वाकिआ यह है कि अभी-अभी मौलाना नानौतवी रहमतुल्लाह अलैहि जसदे उन्सुरी ( जिस्मे जाहिर ) के साथ मेरे पास तशरीफ़ लाए थे जिससे मैं एक दम पसीना -पसीना हो गया और मेरा लेबादा तरबतर हो गया और यह फरमाया कि महमूद हसन को कह दो कि वह इस झगङे में न पङे। बस मैं ने यह कहने के लिए बुलाया है। मौलाना महमूद हसन साहेब ने

पार्ट - 24 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 सिलसिलाए वाकेआत 🕋

वफ़ात के बाद मौलवी क़ासिम नानौतवी का जिस्मे ज़ाहेरी के साथ मदरसाए देवबन्द में आना

( क़ारी तय्यब साहेब मोहतमिम दारुल उलूम देवबन्द बयान करते हैं कि जिस ज़माने में मौलवी रफ़ीउद्दीन साहेब मदरसा के मोहतिमम थे दारुल उलूम के बाज़ मुदर्रेसीन के दरमियान आपस में कुछ नेज़ा ( झगङा ) छिङ गई। आगे चलकर मदरसे के सदर मुदर्रिस मौलवी महमूदुल हसन साहेब भी ह॔गामे में शरीक हो गए और झगङा तूल पकङ गया। अब इसके बाद के वाकिआ क़ारी तय्यब साहेब ही की जुबानी सुनिये मौसूफ़ लिखते है कि।।।।।।

📕 ज़लज़ला, सफ़हा न०-23

पार्ट - 23 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का दूसरा रुख़ 🕋

लेकिन कमाले हैरत के साथ यह ख़बर वहशत असर सुनिए कि यह ख़ुदाई का मंसब यही खुला हुआ कुफ्र व शिर्क और यही तौहीद के मनाफ़ी एतक़ादात उल्माए देवबन्द ने अपने घर के बुजुर्गों के हक़ में बेचुं व चरा तस्लीम कर लिए है।

यह किताब छ: भागों पर मुश्तमिल ( सम्मिलित) है और अलग-अलग हर बाब में देवबन्दी जमाअत के बुजुर्गों के वह वाकिआत व हालात जमा किये गए हैं जिन्हें पढ़ने के बाद आप के दिमाग़ का तार झन झना उठेगा और इन हज़रात की तौहीद परस्ती का सारा भरम खुल जाएगा ।।

हम न कहते कि ऐ दाग़ तू जुलफ़ों को न छेङ ।

अब वह बर्हम है तो है तुझ को क़ल्क या हम को ।

पार्ट - 22 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का दूसरा रुख़ 🕋

ग़ैबदानी का ऐतक़ाद,

दिलों के ख़तरात पर इत्तिला,

सैकङों मील की दूरी से मख़फियाँ का इल्म कि माँ के पेट में क्या है,

बारिश कब होगी,

कल आइन्दा क्या पेश आएगा,

कौन कब मरेगा,

किसकी वफ़ात कहाँ होगी,

दीवार के पीछे क्या है,

अपने इरादा व तसर्रुफ़ात से मारना,

शिफ़ा बख्शना,

बारिश रोक देना, बारिश बरसाना,

इमदाद व दस्तगीरी के लिए आने वाहिद ( at-a time ) में अपनी क़ब्रों से निकल कर दूर-दूर पहुंच जाना,

तसव्वुर करते ही सामने मौजूद हो जाना,

सारे जहाँ को एक नज़र में देख लेना,

मुसीबत के वक्त ग़ायब को अपनी मदद के लिए पुकारना,

गुज़िश्ता और आइन्दा की ख़बरें देना ,

यह समझना कि हर वक्त हमारे दिल के अहवाल की ख़बर रखतें हैं,

यह समझना कि तसव्वुर करते ही बाख़बर हो जाते हैं वग़ैरा -वग़ैरा

यह वही सारी बाते हैं जिन्हें उल्माए देवबन्द की मजकूरुस्सदर ( उफरोक्त ) किताबों में सिर्फ खुदा का हक़ तसलीम किया गया है और ग़ैरे खुदा यहाँ तक कि रसूले मुजतबा सल्लल्लाहु तआलाअलैहिस्सलाम के हक़ में भी इस तरह के एतक़ादात को कुफ्र व शिर्क क़रार

पार्ट - 21 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का दूसरा रुख़ 🕋

क्या इस सूरते हाल को आप मज़हबी तारीख़ का सब से बङा फ़रेब और धोखा नहीं करार देंगे और इस सनसनी ख़ेज़ इन्किशाफ़ के बाद आपके ज़हन की सतह उन हज़रात की जो तस्वीर उभरेगी क्या वह रास्तों के उन ठगों से कुछ मुख़्तलिफ़ होगी जो आँखों में धूल झोंक कर मुसाफ़िरों को लूट लिया करते हैं।

अगर हालात का यह रद्दे अमल ( reaction) फ़ितरत के ऐन मुताबिक है तो सुन लीजिए कि जो सूरते हाल आपने फ़र्ज की थी वह मफ़रुज़ा ( baseless) नहीं बल्कि अमरेवाकिया ( fact ) है। हमारे इस पेशे लफ्ज़ पर आप ऐतमाद न कर सके तो ज़हनी तौर पर एक हैरत अंगेज़ तबदीली के लिए तय्यार होकर वर्क़ उलटिये और देवबन्दी जमाअत के पेशवाओं के वह वाकिआत पढ़िये जिन में अकीदए तौहीद और इस्लामी ईमान की सलामती के सिवा सब कुछ है।

★ मआजल्लाह ★

पार्ट - 20 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का दूसरा रुख़ 🕋

लेकिन आह, मैं किन लफ्जों में इन सरबस्ता राज़ को बेनकाब करूं कि इस ख़ामोश सतह के नीचे एक निहायत ख़ौफ़नाक तूफान छुपा हुआ है तस्वीर के इस रुख़ की दिलकशी उसी वक्त तक बाकी है जब तक कि दूसरा रुख निगाहों से ओझल है।यकीन करता हूं कि पर्दा उठ जाने के बाद तौहीद परस्ती की सारी गरम जोशियों का एक आन में भरम खुल जाएगा। कब्ल इसके कि मैं अस्ले हकीकत के चेहरे से नकाब उठाऊँ। आप के धङकते हुए दिलपर हाथ रख कर एक सवाल पुछना चाहता हूं।

फ़र्ज़ कीजिए, अगर आपको यह बात मालूम हो जाए कि इल्मे ग़ैब से लेकर तसर्रुफ़ व इख़्तियार तक जिन-जिन बातों के एतकाद को देवबन्दी जमाअत के इन पेशवाओं ने रसूले मुजतबा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और दिगर अम्बिया व औलिया के हक़ में कुफ्र व शिर्क और मुनाफिए तौहीद करार दिया है उन्हीं सारी बातों को वह अपने घर के बुजुर्गों के हक़ में जाईज़ बल्कि वाके तस्लीम करते हैं तो आपके ज़हनी वारदात ( mental balance) की क्या कैफ़िय्यत होगी !

★ मआजल्लाह ★

पार्ट - 19 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का दूसरा रुख़ 🕋

अगर किसी तरह की बदगुमानी को राह न दी जाए तो तस्वीर के पहले रुख़ में मसलए इल्मे ग़ैब और कुदरत व तसर्रुफ़ पर देवबन्दी उल्मा की जो इबारत नकल की गई है। उन्हे पङने के बाद एक खाली ज़हन आदमी कतअन यह महसूस किये बगैरन रह सकेगा कि रसूले मुजतबा सल्लल्लाहुअलैहि वसल्लम और दिगर अम्बिया व औलिया के हक़ में इल्मे ग़ैब और कुदरत व तसर्रुफ़ात का अकीदा यकीनन तौहीद के मनाफ़ी और खुला हुआ कुफ्र व शिर्क है और लाज़िनम उसे उल्माए देवबन्द के साथ यह खुश अकीदगी होगी कि वह मज़हबे तौहीद के सच्चे अलम्बरदार और कुफ्र व शिर्क के मोतकेदात के ख़िलाफ़ वक्त के सबसे बङे मुजाहिद है।

★ मआजल्लाह ★


पार्ट - 18 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के मुतफ़र्रिक़ हज़रात की इबारतें .....

(39). हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम बरगुज़ीदा पैग़म्बर थे मगर बर्सो तक अपने प्यारे और चहीते बेटे यूसुफ की ख़बर न मालूम कर सके कि उनका नूरे नज़र कहाँ है और किस हाल में।
#( माहेरुल कादरी फारान का तोहीद नम्बर सफा: 13)

(40). अगर हुजूर आलेमुल ग़ैब होते तो ( हुदैबिया में हज़रत उस्मान की शहादत की ) अफ़वाह के सुनते ही फ़रमा देते कि यह ख़बर ग़लत है। उस्मान मक्का में ज़िन्दा है। सहाबए किराम की इतनी बङी जमाअत तक को असल वाकिया का कश्फ़ नहीं हुवा।
#(माहेरुल कादरी फारान का तौहीद नम्बर : 14 )

पार्ट - 17 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के मुतफ़र्रिक़ हज़रात की इबारतें ~

(37). उन लोगों को अपने दिमाग की मरम्मत करानी चाहिए जो यह लग़वतरीन और अहमक़ाना दावा करते हैं कि रसूलुल्लाह को इल्मे ग़ैब था।
#( आमिर उस्मानी तजल्ली देवबन्द बाबत दिसम्बर :1960,ई )

(38). उलूहिय्यत और इल्मे ग़ैब के दर्मियान एक ऐसा गहारा तअल्लुक है कि क़दीम तरीन ज़माने से इन्सान ने जिस हस्ती में भी खुदाई के किसी शाएबा का गुमान किया है उसके मुतअल्लिक़ ये ख़्याल ज़रूर किया है कि उस पर सब कुछ रौशन है और कोई चीज़ उससे पोशीदा नहीं।
#(मौलाना मौदूदी अलहसनात रामपुर)

पार्ट - 16 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा मौलवी ख़लील अहमद साहब अम्बेठवी लिखते हैं ~

(34). मलकुल मौत से अफ़ज़ल होने की वजह से यह लाज़िम नहीं आता कि आप का इल्म उन उमूर ( यानी रुए ज़मीन) के बारे में मलकुल मौत के बराबर भी हो चे जाए कि ज़्यादा ।
#( बराहीने क़ातेआ, सफा: 52 )

(35). शैख़ अब्दुल हक़ रिवायत करते हैं कि मुझको ( यानी रसूले खुदा को ) दीवार के पीछे का इल्म नहीं है।
#(बराहीने क़ातिआ, सफा: 51)

(36). बहारे राइक़ आलमगीरी दुर्रे मुख़्तार वग़ैरा में है कि अगर कोई निकाह करे ब शहादते हक़ तआला व फख़रे आलम अलैहिस्सलाम के तो काफिर हो जाता है ब सबस ऐतक़ाद इल्मे ग़ैब के फख़रे आलम की बनिस्बत।
#(बराहीने क़ातिआ, सफा: 42)