▫पार्ट -- 12, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 बाब अव्वल 🕋

तक़्लीद के माना और इसके अक़्साम में
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तक़्लीद के दो माना हैं ~
(1).एक तो मानाए लुग़वी,
(2). दूसरा शरई।

लुग़वी माना हैं गले में हार या पट्टा डालना। तक़्लीद के शरई माना यह हैं कि किसी के कहने व करने को अपने ऊपर लाज़िमे शरई जानना यह समझ कर कि उसका कलाम और उसका काम हमारे लिए हुज्जत है, क्योंकि यह शरई मुहक़्क़िक़ है ।

जैसे कि हम मसाइले शरईया में इमाम साहब का क़ौल व फ़ेअल अपने लिए दलील समझते हैं और दलाइले शरईया में 👀 नज़र नहीं करते।

हाशिया हुसामी, बाब मुताबिअत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में सफा: 86, पर शरह मुख़्तसरुल, मनार से नक़्ल किया।

यही इबारत नूरुल_अनवार बहस तक़्लीद में भी है, तक़्लीद के माना हैं किसी शख्स का अपने ग़ैर की इताअत करना इसमें जो इसको कहते हुए या करते हुए सुन ले यह समझ कर कि वह अहले तहक़ीक़ में से है कि बग़ैर दलील में 👀 नज़र किए हुए,

और इमाम ग़ज़ाली किताबुल_मुस्तस्फ़ा, जिल्द- दोम, सफा: 387 में फरमाते हैं ~

अत्तक़्लीदु हुवा क़बूलु क़ौलिन बिला हुज्जतिन

मुसल्लमुस सुबूत में है~

अत्तक़्लीदुल, अमलु बेक़ौलिल, ग़ैरे मिन ग़ैरे हुज्जतिन

तर्जमा वही जो ऊपर ब्यान हुआ, इस तारीफ़ से मालूम हुआ कि हुजूर अलैहिस्सलाम की इताअत करने को

▫पार्ट -- 11, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 तक़्लीद की बहस 🕋
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तक़्लीद के बाब में पाँच बातें ख्याल में रहना ज़रूरी हैं~

(1). तक़्लीद के माना और इसकी किस्में ।

(2). तक़्लीद कौन सी ज़रूरी है और कौन सी मना ।

(3). तक़्लीद किस पर लाज़िम है और किस पर नहीं ।

(4). तक़्लीद के वाजिब होने के दलाइल ।

(5). तक़्लीद पर एतराज़ात और उनके मुकम्मल जवाबात।
इसलिए इस बहस के पाँच बाब किए जाते हैं ।

▫पार्ट -- 10, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 मुक़द्देमा 🕋
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(3). तहरीफ़ यह है कि कुरआन के ऐसे माना या मतलब ब्यान करे जो कि इज्मा_ए_उम्मत या फिर अक़ीद_ए_इस्लामिया या इज्मा_ए_मुफ़स्सेरीन के खिलाफ हो, या खुद तफ़्सीरे कुरआन के खिलाफ हो, और कहे कि इस आयत के वह मानी नहीं हैं बल्कि यह मानी हैं कि जो मैंने कहे, यह खुला हुआ कुफ्र है

जैसे कि आयाते कुरआनिया और किराते मुतवातिरह का इंकार कुफ्र है, ऐसे ही कुरआन के मुतवातिर माना का इंकार कुफ्र जैसे कि मौलवी क़ासिम साहब ने ख़ातमुन्नबीयीन के माना किए असली नबी, और माना आख़िरी नबी को ख़्याले अवाम यानी ग़लत कहा, और नबुव्वत की दो किस्में कर डालीं, असली और आर्ज़ी हालांकि उम्मत का इज्मा और अहादीस का इत्तिफ़ाक़ इस पर है कि ख़ातमुन्नबीयीन के माना हैं आख़िरी नबी और हुजूर अलैहिस्सलाम के जमाना में या बाद कोई नया नबी नहीं आ सकता, यह तहरीफ़ है,

इसी तरह कुरआन की जिन आयातों में ग़ैरल्लाह को पुकारने की मुमानिअत की गई है वहाँ मुफ़स्सेरीन का

▫पार्ट -- 9, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 मुक़द्देमा 🕋
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इस हदीस के हाशिया में मज्म_उल_बिहार से नक़्ल फरमाया ~

तर्जमा यह तो जाइज़ नहीं कि इस इबारत की यह मुराद हो कि कोई भी कुरआन में बग़ैर सुने हुए कुछ कलाम ही न करे। क्योंकि सहाब_ए_किराम ने कुरआन की तफ़्सीर की और आपस में बहुत तरह उनमें इख़्तिलाफ़ रहा।

और उनकी हर बात तो सुनी हुई न थी, नीज़ फिर हुजूर अलैहिस्सलाम का यह दुआ फरमाना बेकार होगा कि ऐ अल्लाह, इनको दीनी फ़िक्ह, दे और इनको तावील सिखा दे।

और हज़रत इमाम ग़जा़ली ने इहया_उल_उलूम बाबे हश्तुम में फ़स्ल चहारुम इस मक़्सद के लिए मुकर्रर की है कि कुरआन का समझना बग़ैर नक़्ल भी जाइज़ है, वह फरमाते हैं कि कुरआन के एक ज़ाहिरी मतलब हैं और एक बातिनी, उलमा ज़ाहिरी मतलब की तहक़ीक़ करते हैं और सोफ़िया, ए, किराम बातिनी की,

हज़रत अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि अगर मैं चाहूं तो सूरह फ़ातिहा की तफ्सीर से 70, ऊंट भर दूँ, और हज़रत अली ने फ़रमाया कि जो शख़्स कुरआन समझ लेता है वह तमामी उलूम को ब्यान कर सकता है फिर जो हदीस में यह आया कि जो शख़्स अपनी राय से कुरआन में कहे वह ख़ताकार है।

इसका मतलब यही है कि जिन बातों का इल्म बग़ैर नक़्ल नहीं हो सकता उनको राय से ब्यान करना हराम है,

▫पार्ट -- 8, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 मुक़द्देमा 🕋
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इस हदीस के मातहत मिर्क़ात में है, वल, मुरादु मिन्हु मा युस्तंबतु बेहिल, मआनी व युदरिकु बेहिल, इशारातु वल, उलूमुल, ख़फ़ीयतु इस फ़हम से मुराद वह इल्म है जिससे कुर-आन के मानी निकाले जाएं और जिससे इशारात मालूम हों और छुपे हुए इल्म का पता लगे।

इस आयत और हदीस से मालूम हुआ कि कुरआनी मायने में ग़ौर करना और इल्म व अक़्ल से काम लेना इससे मसाइल का निकालना जाइज़ है।

हर जगह नक़्ल की ज़रूरत नहीं।

जुमल हाशियाए जलालैन में है ~

तर्जमा तफ़्सीर के लुग्वी मायने हैं ज़ाहिर करना और तावील के मायना हैं लौटना और इल्मे तफ़्सीर कुरआन पाक के उन हालात का जानना है जो अल्लाह की मुराद को बताएं, ताक़ते इंसानी के मुताबिक। फिर इसकी दो क़िस्में हैं। एक तो तफ़्सीर और तफ़्सीर वह है जो नक़्ल के बग़ैर न मालूम हो सके। और एक तावील, और तावील वह है जिसको अरबी काइदों से मालूम कर सकें।

लिहाज़ा तावील का त अल्लुक़ फ़हम (समझ) से है और तावील की राय से जाइज़ होने में और तफ्सीर के राय से

▫पार्ट -- 7, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 मुक़द्देमा 🕋
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चूंकि इस किताब में हर मसला के मुतअ़ल्लिक कुरआनी आयात पेश की जाएंगी और उन आयात की तफ़्सीर भी ब्यान होगी, इसलिए तफ़्सीरे कुरआन के मुत_अल्लिक नीची लिखी बातें लिहाज़ में रखना ज़रूरी हैं।

एक तो है कुरआन की तफ़्सीर, दूसरी कुरआन की तावील, तीसरी कुरआन की तहरीफ़। उनकी अलग-अलग तारीफ़ें हैं और अलग-अलग अहकाम ~

(1). कुरआन की तफ़्सीर अपनी राय से करना हराम है, बल्कि उसके लिए नक़्ल की ज़रूरत है, कुरआन की जाइज तावील अपने इल्म व मारिफ़त से करना जाइज़ और बाइसे सवाब है, कुरआन पाक की तहरीफ़ करना कुफ्र है।

तफ़्सीर उसे कहते कि कुरआने करीम के वह अहवाल ब्यान करना जो कि अक़्ल से मालूम न हो सकें। नक़्ल की उनमें ज़रूरत हो जैसे आयात का शाने नुजूल या आयात का नासिख़ व मन्सूख़ होना, अगर कोई शख्स बगैर हवाला नक़्ल किए अपनी राय से कह दे कि फलां आयत मन्सूख़ है या फलां आयत की यह शाने नुजू़ल है तो यह मोतबर नहीं, और कहने वाला गुनहगार है।

मिश्कात किताबुल_इल्म फ़स्ले दोम (सफा. 35) में है~

मन का़ला फ़िल_कुरआने बेरायही फ़ल्यतबव्ववु मक़्अदहू मिनन्नारे

जो आये उन शख्स कुरआन में अपनी राय से कुछ कहे वह अपनी जगह जहन्नम में बना ले, मिश्कात में उसी

▫पार्ट -- 06, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 दीबाचा 🕋
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मसलए इल्मे ग़ैब में अल_कलिमतुल_औलिया मुसन्निफ़ हज़रत सदरुल, अफ़ज़िल उस्ताज़ी व मुर्शिदी मौलाना अल, हाज सैयद मुहम्मद नईमुद्दीन साहब मुरादाबादी,

तीजा फ़ातिहा वग़ैरह में अनवारे सातिआ मुसन्निफ़ हज़रत मौलाना अब्दुस्समी साहब बेदिल रामपुरी

और मसाला हाज़िर व नाज़िर उर्स व ज़ियारते कुबूर व तमाम मसाइल में तस्नीफा़ते आला हज़रत मुजद्दिद मीअते हाज़िरह मौलाना अहमद रज़ा खाँ साहब बरैलवी कुद्देस सिर्रहुल ,अज़ीज़ वग़ैरह,

मगर ख्याल यह था कि कोई 📖 किताब ऐसी लिखी जाए जो कि इन तमाम बहसों की जामे हो, जिसके पास वह किताब हो वह तक़्रीबन हर मसअले में मुखा़लिफ़ से गुफ़्तगू कर सके और मुसलमानों के अका़इद को उन लोगों से बचा सके, इसलिए मैंने हस्बतन लिल्लाहि इस काम की हिम्मत की, हिम्मत तो कर दी मगर अपनी कम इल्मी और बे बज़ाअती का मुझको पूरा पूरा अहसास है, शुरू करना मेरा काम है और इसको अंजाम पर

▫पार्ट -- 05, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 दीबाचा 🕋
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लेकिन मौजूदा ज़माना में ब-मुकाबला ग़ैर मुकल्लेदीन के ज़्यादा ख़तरनाक देवबन्दी हैं, क्योंकि आम मुसलमान उनको पहचान नहीं सकते, उन लोगों ने अपनी किताबों में हुजूर अलैहिस्सलाम की ऐसी तौहीनें की कि कोई खुला हुआ मुशरिक भी नहीं कर सकता, मगर फिर भी मुसलमानों के पेशवा बनते हैं, और इस्लाम के अकेले ठेकेदार ।

मौलवी अशरफ़ अली साहब थानवी ने हिफ्जुल_ईमान में हुजूर अलैहिस्सलाम के इल्म को जानवरों के इल्म की तरह बताया,

मौलवी ख़लील अहमद साहब अंबेठी ने अपनी किताब 📖 बराहीने क'आतेआ में शैतान और मलकुल, मौत का इल्म हुजूर अलैहिस्सलाम के इल्म से ज़्यादा बताया,

मौलवी इस्माईल साहब देहलवी ने नमाज़ में हुजूर अलैहिस्सलाम के ख़्याल को गधे और बैल 🐂 के ख़्याल से बदतर लिखा,

मौलवी क़ासिम साहब नानौतवी ने, तहज़ीरुन्नास में हुजूर अलैहिस्सलाम को खा़तमुन्नबीयीन यानी आख़िरी नबी मानने से इंकार किया और कहा कि हुजूर अलैहिस्सलाम के बाद अगर और भी नबी आ जाएं तब भी

▫पार्ट -- 04, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 दीबाचा 🕋
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उस जगह पहले एक कुब्बा बना हुआ था जहाँ लोग जाकर नमाज़ें पढ़ते थे और उसकी ज़ियारत करते थे, यह हज़रत आमिना ख़ातून का मकान था और उसी जगह इस्लाम का आफ़ताब चमका, मगर अब उसकी यह बेहुरमती की गई ।

यह तो थे अरब के वाक़ियात लेकिन हमको इस वक़्त हिन्दुस्तान से गुफ़्तगू करनी है दिल्ली में एक शख्स पैदा हुआ जिसका नाम था मौलवी इस्माईल, उसने मुहम्मद बिन अब्दुल, वहाब नज्दी की किताबुत्तौहीद का उर्दू में खुलासा किया, जिसका नाम रखा तक्वियतुल_ईमान और उसकी हिन्दुस्तान में इशाअत की,

वहाबी भी उन्हें शहीद कहते हैं क्योंकि यह हज़रत इसी तक्वियतुल_ईमान की बदौलत सरहदी पठानों के हाथों कत्ल हुए, देखो अनवारे आफ़ताब सदाक़त, मगर मशहूर किया कि सीखों के हाथों मरे।

आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया~
वह वहाबिया ने जिसे दिया है लक़ब शहीद व ज़बीह का,
वह शहीद लैल-ए-नज्द था वह ज़बीहे तेग़े ख़्यार है।

अगर सिखों के हाथों कत्ल हुए होते तो अमृतसर या मशिरक़ी पंजाब के किसी और 🌆 शहर में मारे जाते

▫पार्ट -- 03, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 दीबाचा 🕋
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इस फरमाने आली के मुताबिक बारहवीं सदी में नज्द से मुहम्मद बिन अब्दुलवह्हाब पैदा हुआ, उसने क्या, क्या अहले हरमैन व दीगर मुसलमानों पर ज़ुल्म किए, उसकी दास्तान तो सैफुल, जब्बार और बवारिक़े मुहम्मदिया अला अरग़मातुन्नजदीया वग़ैरह कुतुबे तवारीख़ में देखा, उनके कुछ ज़ुल्म अल्लामा शामी ने अपनी किताब रद्दुल, मुख़्तार जिल्द सोम बाबुल, बुग़ात के शुरू में इस तरह ब्यान फरमाए हैं-

तरजमा जैसे कि हमारे ज़माना में अब्दुलवहाब के मानने वालों का वाक़या हुआ कि यह लोग नज्द से निकले और मक्का व मदीना शरीफ़ पर उन्होंने ग़ल्बा कर लिया ।

अपने को हंबली मज़हब की तरफ़ मन्सूब करते थे, लेकिन उनका अ़क़ीदा यह था कि सिर्फ़ हम ही मुसलमान हैं, और जो हमारे अ़क़ीदे के खिलाफ है वह मुशरिक है,

इसलिए उन्होंने अहले सुन्नत वल जमाअत का कत्ल जाइज़ समझा और उनके उलमा को क़त्ल किया, यहाँ तक कि अल्लाह ने वहाबियों की शौकत तोड़ी और उनके 🌆 शहरों को वीरान कर दिया, और इस्लामी लश्करों को उन पर फ़तह दी,

यह वाक़या 1233,हिजरी में हुआ,
सैफुल, जब्बार वग़ैरह में उनके ज़ुल्म बे, शुमार ब्यान फरमाए कि मक्का मुकर्रमा व मदीना तैयबा में बेगुनाहों को बे, दरेग़ क़त्ल किया और हरमैन शरीफ़ैन के रहने वालों की औरतों और लड़कियों से ज़िना किया, उनको ग़ुलाम बनाया उनकी औरतों को अपनी लौंडिया, सादाते किराम को बहुत क़त्ल व ग़ारत किया, मस्जिदे नबवी शरीफ़ के

▫पार्ट -- 02, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 दीबाचा 🕋
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अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ी यमीनेना

ऐ अल्लाह, हमको हमारे यमन में बरकत दे,

हाज़िरीन में से कुछ ने अर्ज़ किया

व फ़ी नज्दिना या रसूलल्लाह, दुआ फ़रमाएं कि हमारे नज्द में बरकत दे फिर हुजूर अलैहिस्सलाम ने वही दुआ फ़रमाई, शाम और यमन का जिक्र फ़रमाया मगर नज्द का नाम न लिया,

उन्होंने फिर तवज्जोह दिलाई कि व फ़ी नज्दिना हुजूर यह भी दुआ फरमाए कि नज्द में बरकत हो, ग़रज़ तीन बार यमन और शाम के लिए दुआएं फरमाई, बार, बार तवज्जोह दिलाने पर नज्द को दुआ न फरमाई,,

बल्कि आख़िर में फरमाया मैं इस अज़्ली महरूम ख़ित्ता को दुआ किस तरह फरमाऊँ, वहाँ तो ज़लज़ले और फ़ित्ने होंगे, और वहाँ शैतानी गरोह पैदा होगा ।

इससे मालूम हुआ कि हुजूर सैयदे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निगाहे पाक में दज्जाल के फ़ित्ना के बाद नज्द का फ़ित्ना था जिससे इस तरह ख़बर दे दी।

इसी तरह मिशकात जिल्द अव्वल किताबुल किसास बाब क़त्लु अहिलर्रद्दे (स०.309) में ब, हवाला नसाई हज़रत अबू बरज़ह रज़ि, अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि -

हुजूर अलैहिस्सलाम एक बार कुछ माले ग़नीमत तक़्सीम फ़रमा रहे हैं, एक शख़्स ने पीछे से अर्ज़ किया या

▫पार्ट -- 01, ✅ जा_अल_हक़ ✅

🕌 दीबाचा 🕋
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🌹अल्हदुलिल्लाहि रब्बिल, आलमीन ,खा़लिक़िस्समावाति वल, अर्दीना वस्सलातु वस्सलामु अला मन काना नबीयन व आदमु बैनल, माइ वत्तैय्यिबीन, अज्मलिल, अजमलीन, अकमलिल, अकमलीन, सैयदिना मुहम्मदिन व आलेही व अस्हाबेही व अहले बैतेही अज्मईन। 🌹

✳️ दीने इस्लाम को दुनिया में तशरीफ़ लाए हुए आज तक़्रीबन पौने चौदह सौ बरस गुज़रे, इस अरसा में इस पाक दीन ने हजा़रहा बलाओं से मुक़ाबला किया।

हुजूर अलैहिस्सलाम के इस लहलहाते हुए चमन पर बहुत सी तेज़ आंधियाँ आई और अपना, अपना जो़र दिखा कर चली गई, मगर अल्हम्दुलिल्लाह कि यह चमन इसी तरह सर सब्ज़ व शादाब रहा, इस आफ़ताब पर बारहा काले बादल और ग़ुबार आए, मगर यह आफ़ताब इसी तरह चमकता रहा और क्यों न होता कि रब तआ़ला खुद इस दीन का हाफ़िज़ व नासिर है खुद फ़रमाता है -

" इन्ना नहनु नज़्ज़लनज़्ज़िक्रा व इन्ना लहू लहाफ़िज़ून "

हमने ही कुरआ़न उतारा और हम ही इसके मुहाफ़िज़ हैं।

कभी इस पर यज़ीदी बादल आए और कभी हुज्जाजी गुबार कभी मामूनी ताक़त ने इसके सामने आने की जुरअत की, और कभी तातारी कुव्वतें इससे टकराईं, कभी खा़र्जी हमले ने इससे मुका़बला किया और कभी रफ़्ज़ की