छींक, जमाही वैगरह में जो हुरूफ़ निकलते हैं


मस्अला:-  छींक, जमाही (बगासु-Yawn), खांसी और डकारने (ओडकार-Bleching) में जितने हुरूफ (अक्षर) निकलते हैं वोह मजबुरन निकलते हैं और मजबूरन निकलने की वजह से मुआफ हैं, नमाज़ फासिद नहीं होती।

#(दुर्रे मुख्तार; बहारे शरीअत हिस्सा-3 सफ़ा-150)
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नमाज़ में आह, ओह, उफ, तुफ, हाय वैगरह कहना


मस्अला:- नमाज़ की हालत में दर्द, तकलीफ या मुसीबत की वजह से मुंह से 'आह' या 'ओह' या 'उफ' या 'तुफ' या 'हाए' अल्फाज़ (शब्द) निकले, या आवाज़ से रोया (रूदन-Cry) और रोने में किसी तरह के हर्फ पैदा हुए (या'नी मुंह से निकले), तो इन तमाम सूरतों में नमाज़ फासिद हो जाएगी और अगर रोने में सिर्फ आंसू निकले और आवाज तथा हर्फ न निकले तो हर्ज नहीं और अगर अल्लाह तआला के खौफ (डर) से रोया और आवाज़ निकली, तो नमाज़ फासिद नहीं होगी।

#(दुर्रे मुख्तार; बहारे शरीअत)
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मुक्तदी के सिवा किसी दूसरे का लुकमा लेना


मस्अला:- इस तरह मुक्तदी के सिवा किसी दूसरे का लुकमा लेने से भी नमाज फासिद हो जाती है।

मस्लन इमाम ने किरअत में गलती की, या मुनफरिद ने किरअत में गलती की, या इमाम ने अरकाने-नमाज़ में कोई गलती की, मिसाल के तौर पर एक रकअत के बाद का'दा कर लिया और इमाम की गलती पर ऐसे शख्स ने लुकमा दिया जो जमाअत में शरीक (शामिल) नहीं, और इमाम ने उसका लुकमा कुबूल कर लिया, तो नमाज़ फासिद हो जाएगी।

#(दुर्रे मुख़्तार; रद्दुल मोहतार; फतावा रिज़वीया जिल्द-1 सफ़ा-226)
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अपने इमाम के सिवा किसी दूसरे को लुकमा देना


मस्अला:- नमाजी ने अपने इमाम के सिवा किसी दूसरे को लुकमा दिया, तो नमाज़ फासिद हो गई, और जिसको लुकमा दिया, वोह नमाज में हो या न हो या'नी, वोह नमाज़ में कुरआन पढ़ता हो, या बैरूने नमाज़ या'नी नमाज़ के बाहर कुरआन पढता हो।

मस्लन करीब में बैठकर कोई शख़्स कुरआने-मजीद की तिलावत कर रहा था और तिलावत में गलती की और उस की गलती पर नमाजी ने उस को लुकमा दिया, तो लुकमा देने वाले की नमाज़ फासिद हो गई। इलावा अज़िं वोह गलत पढ़नेवाला नमाज़ में चाहे मुनफरिद हो, या मुक्तदी हो, या किसी दूसरे का इमाम हो।

नमाज़ में जल्ला-जलालहू, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम या हाँ कहना


मस्अला:- अल्लाह-तबारक-व-तआला का नामे-जात 'अल्लाह' या दूसरा कोई सिफाती नाम सुनकर 'जल्ला-जलालहू' कहा, या हुजूरे-अकदस सरकारे-दोआलम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम का मुबारक नाम सुनकर 'सल्लल्लाहो तआला अलैहे वसल्लम' कहा तो नमाज़ फासिद हो जाएगी।

#(दुर्रे-मुख़्तार; रद्दुल मोहतार; बहारे-शरीअत हिस्सा-3 सफ़ा-150; फतावा रिज़वीया जिल्द-3 सफ़ा-449)


नमाज़ की हालत में ज़बान पर 'नअम' (Yes), या 'अरे' या 'हाँ' जारी हो गया, तो नमाज़ फासिद हो गई।

#(दुर्रे मुख़्तार)
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नमाज़ में 'इन्ना-लिल्लाही-व-इन्ना-इलैही-राजीउन' कहना


मस्अला:- खुशी की खबर सुनकर 'अल-हम्दुलिल्लाह' कहा, या बुरी खबर सुनकर 'इन्ना-लिल्लाही-व-इन्ना-इलैही-राजीउन' कहा, तो नमाज फासिद हो जाएगी।

#(आलमगीरी; बहारे शरीअत हिस्सा-3, सफ़ा-150; फतावा रिज़वीया, जिल्द-1, सफ़ा-230)
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नमाज़ में छींक आने पर अल्हम्दुलिल्लाह कहना


मस्अला:- नमाज़ी को हालते नमाज़ में छींक (Sneeze) आए, तो सुकूत करे, (या'नी कुछ भी न कहे) अगर 'अल-हम्दुलिल्लाह' कहे लिया, तो नमाज़ में हर्ज नहीं, लेकिन हालते नमाज़ में 'अल-हम्दु-लिल्लाह' न कहे, बल्कि नमाज़ से फारिग होने के बा हम्द करे।

#(आलमगीरी; बहारे शरीअत)
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नमाज़ में छींक का जवाब देना


मस्अला:-  किसी को छींक आई और नमाज़ी ने उसको जवाब देते हुए ‘यरहमोकल्लाह' कहा, तो नमाज़ फासिद हो गई।

#(आलमगीरी; बहारे शरीअत हिस्सा-3 सफ़ा-149)
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4 के बदले 2 रकअत वाली नमाज़ समझ कर सलाम फेर दिया


मस्अला:- चार (4) रकअत वाली नमाज़ पढ़ रहा था और दो (2) रकअत वाली नमाज़ पढ़ रहा हूं, येह समझकर दो (2) रकअत पर सलाम फेर दिया, तो नमाज़ फासिद हो गई। उस पर 'बिना' भी जाइज़ नहीं। अज़-सरे-नौ (फिरसे) पढ़े।

#(आलमगीरी; बहारे-शरीअत हिस्सा-3 सफ़ा-149)
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नमाज़ में किसी को सलाम करना या जवाब देना


मस्अला:- नमाज़ में किसी को सलाम किया या किसी के सलाम का जवाब दिया या'नी 'अस्सलामो-अलैकुम' या 'व-अलैकुमुस-सलाम' कहा, या सिर्फ 'सलाम' ही कहा, या सलाम की निय्यत से मुसाफहा (हस्तधून-Shake hand) किया, तो नमाज़ फासिद हो गई।

#(आलमगीरी; दुर्रे मुख़्तार)
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नमाज़ में बैठ जाओ कहना



मस्अला:-  कलाम करने में ज़्यादा या कम बोलने का फर्क नहीं और येह भी फर्क नहीं कि वोह कलाम नमाज के बाहर के काम के मुतअल्लिक (सम्बन्धित) हो, या नमाज के मुतअल्लिक या'नी नमाज की इस्लाह (सुधार) के लिये हो, मस्लन इमाम का'द-ए-उला में बैठना भूल गया और तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो गया और मुक्तदी

नमाज़ में बात करना



मस्अला:- नमाज़ की हालत में कलाम (बात) करने से नमाज़ फासिद हो जाएगी फिर चाहे वोह कलाम करना अमदन हो, या ख़्ताअन हो या सहवन हो।

अमदन (जान बूजकर-Purposely) कलाम करने से येह मुराद है कि उसको मालूम था कि नमाज़ में कलाम करने से नमाज़ फासिद हो जाती है, फिर भी उसने जान बूजकर कलाम किया।

खताअन (दोष, क्षति-Mistake. Fault) कलाम करने से येह मुराद है कि उसे येह मस्अला मा'लूम ही न था कि नमाज़ में कलाम करने से नमाज़ फासिद हो जाती है और उसने कलाम कर लिया या किरअत वगैरह अज़कारे-नमाज़ कहना चाहता था और गलती से जबान से कोई जुमला (वाक्य) निकल गया।

सहवन (बिना इरादा, भूल से-Erroneously) कलाम करने से येह मुराद है कि उसको अपना नमाज़ में होना याद