⚡ क़ब्रे अनवर में नक़ब ⚡

577 हिजरी मुल्के शाम की बात है उस वक़्त वहां के बादशाह सुल्ताने आदिल हज़रत नूर उद्दीन जंगी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि थे, एक रात आप तहज्जुद की नमाज़ पढ़कर सो रहे थे अचानक एक ही रात में 3 बार ये ख्वाब देखा कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आपको 2 लोगों की सूरत दिखाकर फरमा रहे हैं कि ऐ नूर उद्दीन इन दोनों को मुझसे जुदा करो ये ख्वाब देखकर बादशाह बहुत बेचैन हुए और अपने आलिम वज़ीर जमाल उद्दीन मूसली से इसकी ताबीर पूछी तो वो फरमाते हैं कि ज़रूर मदीना तय्यबह में कोई बड़ा हादसा हुआ है या होने वाला है लिहाज़ा बिना देर किये हमें वहां पहुंचना चाहिये, बादशाह ने सिर्फ अपने खास 20 लोगों के साथ कसीर दौलत लेकर मदीना का सफर शुरू किया और 16 दिन के बाद मदीना पहुंचे, मस्जिदे नब्वी शरीफ में 2 रकात नफ्ल शुक्राना अदा की और अपने वज़ीर के ज़रिये ये ऐलान करवाया कि बादशाह यहां ज़ियारते नब्वी के लिए हाज़िर हुए हैं और तमाम लोगों को नज़राना पेश करना चाहते हैं इसलिए तमाम अहले मदीना से गुज़ारिश है कि वो आकर हदिया क़ुबूल करें, ये ऐलान सुनकर लोगों का हुजूम लग गया और सब आकर नज़राना लेते रहे और बादशाह सबको बगौर देखते रहे मगर वो 2 शक्लों वाले नहीं दिखे और तमाम लोग जा चुके थे, बादशाह ने वहां के सरदार से पूछा कि क्या अब भी कोई बचा रह गया है तो उन्होंने बताया कि यहां का रहने वाला तो कोई नहीं बचा हैं मगर 2 लोग जो कि बहुत ही मुत्तक़ी व परहेज़गार हैं हमेशा नमाज़ व अज़कार में ही लगे रहते हैं और खुद बहुत मालदार हैं कि अक्सर गरीबों की मदद करते रहते हैं वही दोनों नहीं आये हैं, बादशाह ने उन दोनों को भी तलब फरमाया जब वो दोनो आये तो बादशाह की आंखें खुली की खुली रह गई क्योंकि ये दोनों वही ख्वाब वाले शख्स थे ।

बादशाह उन दोनों को लेकर उनके कमरे तक पहुंचे जो कि रौज़-ए-अनवर से कुछ ही दूरी पर था जब अंदर जाकर देखा तो वहां दरहमो दीनार के ढेर लगे हुए थे, बादशाह ने पूछ-ताछ की मगर कोई सुराग ना मिला वो यही कहते रहे कि हमें आपके नज़राने की ज़रूरत ना थी इसलिए हाज़िर नहीं हुए, सिपाहियों ने पूरे घर का मुआयना कर लिया मगर कुछ हाथ ना लगा तब बादशाह ने ज़मीन से कालीन हटाने को कहा तो वहां एक सुरंग नज़र आयी अब बादशाह ने उन दोनों को कोड़े लगवाने शुरू कर दिए तो उन लोगों ने ये राज़ खोला कि हम रोम की ईसाई हैं और हमें यहां हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की लाश मुबारक को लाने के लिए भेजा गया था क्योंकि मुसलमानों की असली ताक़त उन्हीं से है तो हम उनके जस्दे मुबारक को ही यहां से हटा देते, हम रात भर सुरंग के ज़रिये मिटटी निकालते और सुबह वो मिटटी थैलों में भरकर जन्नतुल बक़ीअ में फेंक आते थे अब शायद एक या दो दिन का काम ही रह गया था कि हम बिलकुल रौज़-ए-अनवर तक पहुंच गए थे मगर आप आये और हमारी गिरफ्तारी हो गयी, बादशाह ने उन दोनों को क़त्ल करवा दिया और रौज़-ए-अनवर की गहरी बुनियाद खुदवाकर उसमें पिघला हुआ शीशा भरवा दिया कि आईंदा किसी नापाक के दिमाग में भी यहां नक़ब लगाने का ख्याल ना आये, और जब तक ये सारा काम होता रहा बादशाह सलामत वही खड़े रोते रहे और यही कहते रहे कि मैं अपनी किस्मत पर किस क़दर नाज़ करूं कि मेरे सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पूरी दुनिया में मुझे इस काम के लिए चुना और अपना दीदार कराया ।

📕 रूहानी हिकायत, जिल्द 2, सफह 11


दुनिया के तमाम धरम वाले ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि मुसलमानो का मरकज़ मदीना है और उनकी ताक़त हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ाते मुक़द्दसा, इसीलिए कुछ जाहिल अक्सर मुसलमानों को कमज़ोर करने के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ाते बाबरकात पर हमला करते रहते हैं मगर वो ये नहीं जानते कि इन सब बातों से मुसलमान कमज़ोर नहीं होता बल्कि अपने नबी पर जानो माल क़ुर्बान करने का उसका जज़्बा और बुलंद हो जाता है, यहां एक ऐतराज़ को दफअ करता चलूं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो मालिको मुख्तार हैं तो क्यों उन्होंने खुद अपने आप को ना बचा लिया तो इसका जवाब ये है कि बेशक वो मालिको मुख्तार हैं वो चाहें तो आन की आन में कायनात को पलट कर रख दें मगर वो खुद ऐसा करते तो किसी को पता ना चलता और वो दोनों मर खपकर कहीं पड़े रह जाते इसलिए किसी के ज़रिये उन लोगों को सज़ा दिलवाकर आईन्दा आने वाले लोगों को आगाह भी कर दिया और मुसलमानो की अज़मतो बुलन्दी का मरकज़ भी तय फरमा दिया ।

📚 हदीस शरीफ़ की मज़ाक उड़ाने का अंजाम 🔥

हदीस शरीफ़👇हज़रत अबू दरदा रज़िअल्लाहू त‌आला अन्ह से मरवी है के
रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ~

जो शख़्स इल्म ए दीन हासिल करने के लिए सफ़र करता है तो ख़ुदा ए त‌आला उसे जन्नत के रास्तों में से एक रास्ता पर चलाता है और तालिब ए इल्म की रज़ा हासिल करने के लिए फ़िरिश्ते अपने परों को बिछा देते हैं।

📗मिश्कात शरीफ़, सफ़ा 34


हज़रत मुल्ला अली क़ारी रहमातुल्लाहि तआला अलैह फ़रमाते हैं~

इस हदीस शरीफ़ में इस बात की जानिब इसारा है के जन्नत के रास्ते इल्म के रास्तों में महदूद हैं इसलिए के नेक अमल बग़ैर इल्म के मक़सूद नहीं।

📗मिरक़ात जिल्द 1, सफ़ा 229

और तहरीर फ़रमाते हैं के
अहमद बिन शुएब से रिवायत है
उन्होंने बयान किया के हमने शहर ए बशरा में इस हदीस शरीफ़ को एक मुहद्दिस से बयान किया जबके उस मजलिस में एक बदमज़हब मुअतज़ली भी बैठा हुआ था जो इल्म हासिल करने के लिए आया हुआ था उसने इस हदीस शरीफ़ का मज़ाक उड़ाते हुए कहा
कल हम जूता पहनकर चलैगे और उससे फ़िरिश्तों के परों को रौंदेंगे
जब अपने कहने के मुताबिक़ दूसरे दिन वो जूता पहनकर चला तो धड़ाम से गिर गया और उसके पैरों में मर्ज़ आक्ला पैदा हो गया जिससे उसके दोनों पैर सड़ गये।

📗मिरक़ात शरह मिश्कात, जिल्द 1, सफ़ा 229

और तिबरानी ने कहा के मैंने इब्ने
याहया साजी से सुना वो बयान करते थे के हम एक मुहद्दिस के यहां जाने के लिए बशरा शहर की गलियों में से

💫 अंजीर-Fig 💫

अंजीर बुनियादी तौर पर मशरिके वुस्ता और एशियाई कोचक का फल है अगर चे अब ये हिंदुस्तान में भी पाया जाता है मगर मुसलमानों की हिंदुस्तान में आमद से पहले इसका कोई सुराग नहीं मिलता, इसलिए यही सही है कि इसे मुसलमान ही हिंदुस्तान लेकर आये और इसकी काश्त की मगर 1000 साल गुज़र जाने के बाद भी आज इसकी काश्त इस तौर पर नहीं की जाती कि वो तमाम लोगों की ज़रूरत को पूरा कर सके लिहाज़ा तुर्की, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, ईरान, फिलिस्तीन, शाम और लेबनान से इसे मंगाया जाता है, कहते हैं फलों में ये सबसे नाज़ुक फल है कि पकने के बाद खुद ही पेड़ से गिर जाता है और दूसरे दिन तक इसे महफूज़ रखना मुश्किल हो जाता है सो इसे सुखाकर ही इस्तेमाल लायक बनाया जाता है, इसके फज़ायल के लिए इतना ही काफी है कि क़ुर्आन में अल्लाह तबारक व तआला इसकी कसम याद फरमाता है, इरशाद फरमाया ~
 
कंज़ुल ईमान - कसम अंजीर और ज़ैतून की

📕 पारा 30, सूरह वत्तीन, आयत 1


तफसीर - अंजीर एक उम्दा मेवा है जिसमे फुज़्ला नहीं है बहुत तेज़ हज़म होने वाला जिगर और मेदे की इस्लाह करने वाला बलगम को निकालने वाला और कमज़ोर जिस्म को फरबा करने वाला है ।

📕 खज़ाएनुल इरफान, सफह 709


हदीस - हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में अंजीर से भरा हुआ एक तश्त आया तो आप फरमाते हैं कि अगर कोई कहे कि क्या जन्नत से फल ज़मीन पर आ सकता है तो मैं कहूंगा यही है वो, तो इसे खाओ कि अंजीर बवासीर को खत्म कर देता है और गठिया यानि जोड़ों के दर्द में मुफीद है।

तिब - इसके अलावा ये गुर्दे और पित्त से पथरी को तोड़कर निकाल देने में कारगर है मगर बासी मुंह 6 दाने के

💫 अक़ायद 💫 क्या किसी काफिर को काफिर नहीं कहना चाहिये ??

✳️ क्या किसी काफिर को काफिर नहीं कहना चाहिये आईये क़ुर्आन से ही पूछ लेते हैं, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फरमाता है ~

कंज़ुल ईमान - तुम फरमाओ ऐ काफिरों !

📕 पारा 30, सूरह काफिरून, आयत 1


कंज़ुल ईमान - बेशक ज़रूर उन्होंने कुफ्र की बात कही और इस्लाम में आकर काफिर हो गये ।

📕 पारा 10, सूरह तौबा, 74


कंज़ुल ईमान - बहाने ना बनाओ तुम काफिर हो चुके मुसलमान होकर।

📕 पारा 10, सूरह तौबा, आयत- 66


मगर आज कुछ बेवकूफ लोग हमसे ये कहते नज़र आते हैं कि किसी काफिर को काफिर ना कहना चाहिये कि पता नहीं वो कब मुसलमान हो जाये, ऐसा ऐतराज़ करने वाला बड़ा जाहिल है क्योंकि अगर काफिर को काफिर ना कहने की यही दलील है तब तो किसी मुसलमान को भी मुसलमान ना कहना चाहिये पता नहीं कि वो कब काफिर हो जाये माज़ अल्लाह,

आखिर वहाबी मुसलमान के घर पैदा होकर भी काफिर हो ही रहा है, और फिर देखिये कि रब क़ुर्आन मुक़द्दस में काफिर को तो काफिर कह ही रहा है मगर उन लोगों को भी काफिर कह रहा है जिन्हे खुद मुसलमान कहा यानि मुसलमान तब ही तक मुसलमान कहलायेगा जब तक कि ईमान पर क़ायम हो और जिस दिन वो ईमान से फिरा तो काफिर ही कहलायेगा, पर आज कुछ लोगों ने ईमान को अपने बाप की जायदाद समझ लिया है कि चाहे माज़ अल्लाह खुदा व रसूल और उसके वलियों की शान में लाख गुस्ताखी करो मगर जायदाद की तरह अपना ईमान कहीं जा नहीं रहा है कि वो तो बाप की जागीर है उसे तो हासिल कर ही लेंगे, ऐसे लोगों के लिए क़ुर्आन की कुछ आयतें पेश करता हूं, मौला तआला इरशाद फरमाता है-

कंज़ुल ईमान - क्या लोग इस घमण्ड में हैं कि इतना कह लेने पर छोड़ दिये जायेंगे कि हम ईमान लाये और उनकी आज़माईश ना होगी ।

📕 पारा 20, सूरह अन्कबूत, आयत 1


कंज़ुल ईमान - जो कुछ आमाल उन्होंने किये हमने सब बरबाद कर दिये।

📕 पारा 19, सूरह फुरक़ान, आयत 23


कंज़ुल ईमान - अमल करें मशक़्क़त झेलें और बदला क्या होगा ये कि भड़कती आग में बैठेंगे ।

📕 पारा 30, सूरह ग़ाशिआ, आयत 3-4


अमल करें मशक्क़त झेलें यानि रात-रात भर जागकर नमाज़ पढ़ें, दिन को भूखा प्यासा रहकर रोज़ा रखें,

आला हज़रत

कुछ गैरों ने पूछा तुम लोग आलाहज़रत को इतना क्यों मानते हो -?
तो कहा : कान खोल के सुनो ________

इस दुनियां में बहुत कलमगार आये ,

किसी ने कलम उठाया लैला का ज़िक्र किया ,

किसी ने कलम उठाया मजनूं का ज़िक्र किया ,

किसी ने क़लम उठाया शीरी का ज़िक्र किया ,

किसी ने क़लम उठाया फरहाद का ज़िक्र किया ,

लेकिन आला हज़रत ने जब , जब क़लम उठाया किसी दुनियादार का नहीं बल्कि मदीने के ताजदार ﷺ  के बारे में ज़िक्र किया।

आप देखो तो सही क्या खूब फ़रमाते हैं आला हज़रत :
👇🏽

उन्हें जाना , उन्हें माना , न रखा गैर से काम , लिल्लाहिल हम्द मैं दुनिया से मुसलमान गया ।


क़लम उठा आला हज़रत का तो  नबी ﷺ की पेशानी  के बारे में लिखा :

जिस के माथे शफ़ाअत का सेहरा रहा, उस ज़बीने सआदत पे लाखों सलाम ।


क़लम उठा आला हज़रत का तो नबी ﷺ के  गोशे मुबारक  के बारे में लिखा :

दूरो नज़दीक के सुनने वाले वो कान , काने लाले करामत पे लाखों सलाम.


क़लम उठा आला हज़रत का लबे मुस्तफ़ा ﷺ  के बारे में लिखा :

पतली पतली गुले क़ुदस की पत्तियां , उन लबों की नज़ाक़त पे लाखों सलाम .


जब क़लम उठा आला हज़रत का  आमदे हुज़ूर ﷺ के बारे में लिखा :

जिस सुहानी घड़ी चमका तैबा का चाँद उस दिल अफरोज साअत पे लाखों सलाम.


क़लम उठा आला हज़रत का शहरे रसूल ﷺ  के बारे में लिखा :

हरम की ज़मीं और क़दम रख के चलना अरे सर का मौक़ा है ओ जाने बाले .


क़लम उठा आला हज़रत का  नबी की हयात ﷺ  के बारे में लिखा :

तू ज़िन्दा है वल्लाह , तू ज़िंदा है वल्लाह मेरे चश्मे आलम से छुप जाने बाले.


क़लम उठा  आला हज़रत का तो  अताये रसूल ﷺ  के बारे में लिखा :

मेरे करीम से गर , क़तरा किसी ने माँगा, दरिया वहा दिए हैं दुरबे बहा दिए हैं..

💟 HAASHIM 💟

✳ HUZOOR NABI KAREEM ﷺ K PAR DADA “HASHIM” BADI SHAAN O SHAUKAT K MAALIK THE, UNKA ASLI NAAM “UMRO” THA INTEHAAYI BAHADUR, BE HADD SAKHI AUR AALA DARJE K MEHMAAN NAWAAZ THE.

✳ EK SAAL ARAB MEIN BAHOT SAKHT QEHET PAD GAYA AUR LOG DAANE DAANE KO MOHTAAJ HOGAYE TO YE MULK E SHAAM SE KHASHK ROTIYAAN KHAREED KAR HAJJ K DINO MEIN MAKKAH SHARIF PAHONCHE AUR ROTION KA CHOORA KARKE OONT K GOSHT K SHORBEY MEIN SAREED BANAKAR TAMAAM HAAJIYO KO KHOOB PET BHAR KAR KHILAAYA.

💠 US DIN SE LOG UNKO “HAASHIM” ROTIYO KA CHOORA KARNE WAALA KEHNE LAGE.

📘  (MADARIJ UN NABUWATH, JILD 2, PG 8)

❇ CHUNKE YE “ABD MUNAAF” K SAB LADKO MEIN BADE AUR BA SALAHIYAT THE, ISLIYE ABD MUNAAF K BAAD KAABA SHAREEF K MUTAWALLI AUR SAJJADA NASHEEN HUYE, BAHUT HASEEN O KHOOBSURAT THE.

❇ JAB SIN SHA’OOR KO PAHONCHE TO UNKI SHAADI MADINA SHAREEF MEIN QABEELA KHAZRAJ K EK SARDAAR UMRO KI SAAHEBZAADI SE HUYI JINKA NAAM SALMA THA AUR UNKE SAAHEBZAADE SE “ABDUL MUTALLIB” MADINA SHAREEF HI

💟 BARGAAH E NABAWI K AADAAB 💟

✳ HAZRAT QAAZI ALLAMA AYAAZ NE FARMAYA~


💠 HUZOOR PURNOOR K PARDA FARMAANE K BAAD BHI HAR UMMATI PAR AAP KI ITNI HI TAZEEM O TAUQEER LAAZIM HAI JITNI K AAP KI ZAAHIRI HAYAAT MEIN THI.

💠 CHUNANCHE KHALIFA E BAGHDAD ABU JAFAR MANSOOR ABBASI JAB MASJID E NABAWI MEIN AAKAR ZOR ZOR SE BOLNE LAGA TO HAZRAT IMAM MAALIK NE USKO YE KEH KAR DAANT DIYA K AYE AMEER UL MOMINEEN YAHAAN BULAND AWAAZ SE GUFTAGU NA KIJIYE KYUNKE ALLAH TA’ALA NE QURAN MEIN APNE HABEEB K DARBAAR KA YE ADAB SIKHAAYA HAI K-

⭐  يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ (2)

📖 TARJUMA:

✅  AYE IMAAN WAALON APNI AWAAZEY OONCHCI NA KARO US GAIB BATANE WAALE (NABI) KI AWAAZ SE AUR UNKE HUZOOR BAAT CHILLA KAR NA KAHO JAISE AAPAS MEIN EK DUSRE K SAAMNE CHILLATE HO K KAHIN TUMHARE AMAL AKAARAT NA HO JAAYE AUR TUMHE KHABAR NA HO.

📗 (SUREH AL HUJURAAT, AAYAT 02)


⭐  إن حرمة النبي (صلى الله عليه وسلم) ميتا كحرمته حيا
✅ AUR AAP KI WAFAAT E AQDAS K BAAD BHI HAR UMMATI PER AAP KI UTNI HI

☪ NAMAZ KYA HAI? ☪

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 بسم الله الرحمن الرحيم
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✳️ Namaz tamaam zaruriyaat_e_deen par dil_o_jaan se imaan lane k baad pehla farz hai. Namaz aesa farz hai jo kisi surat muaaf nahi hai, agar khade hokar nahi padh sakte to baithkar Namaz padhna agar baith kar nahi padh sakte to let kar ishaaro se Namaz padhna laazim hai.

☀ Is farz ki ehmiyat ka andazah is baat se lagayiye k aadmi aankho se andha hai kaano se behra hai zubaan se bol nahi sakta haath aur pairo se mazoor hai ab kya cheez baaqi reh gayi hai in surton me bhi namaz muaaf nahi.


❄ NAMAZ K FAWAED

1).  Namaz pareshaniyo aur bimariyo ko dur karti hai.

2). Namaz rozi me khair o barkat laati hai.

3). Namazi ko duniya mein, aakhirat mein, qabar mein, hashr mein surkhuruyi yaani kamiyaabi ata ki jaati hai.


❄ NAMAZ CHODNE K NUQSANAAT

1). Benamazi ka hashr firaun, hamaan k saath hoga.

2). Benamazi jab marega to puri duniya ka paani pila diya jaaye magar uski pyaas nahi bujhegi.

❌ KYA SAFAR KA MAHINA NAHUSAT WAALA HAI (Maaz Allah)..??

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 بسم الله الرحمن الرحيم
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TAFSEER ROOH UL BAYAAN mein hai~


❇ Safar wagaera kisi mahine ya makhsoos waqt ko manhoos samajhna durust nahi, tamaam auqaat ALLAH TA’ALA k banaye huye hain aur in mein insan k amaal waqe hote hain, jis waqt banda_e_momin ALLAH TA’ALA ki ita’at_o_bandagi mein mashghool ho wo waqt Mubarak hai aur jis waqt mein ALLAH TA’ALA ki nafarmaani kare wo waqt uske liye manhoos hai, dar haqeeqat asal

💟 SHAAN E IMAM E AHLE SUNNAT 💟

✳️  Shaan e Imam e Ahle Sunnat Mujaddid e Deen o Millat Aala Hazrat Imam Ahmed Raza Khan رضي الله عنه Faazil e Bareilly 
 بسم الله الرحمن الرحيم 
 
➡️ Doosri martaba jab Ziyarat e Haramain Shareefain ke liye Madina Tayyaba mein hazir huwe, to shauk e deedar mein muwajah e shareef ke saamne khade ho kar rote rahe.

Darood o Salaam pesh karte rahe aur yeh ummeed lagaaye khade rahe ke aaj Huzoor ﷺ zaroor nigaahe karam farmayenge aur apni ziyarat se zaroor musharraf farmayenge.

Lekin uss shab ziyarat na ho saki, Aapka dil bahut toota aur ussi toote huwe dil ke saath ek kalaam aapne likha, Jis ke pehle chand ash'aar yeh hain-

Wo sue lalazaar phirte hain, Tere din ae bahaar phirte hain
Us gali ka gada hu maiñ jis mein, Maangte taajdar phirte hain


🔆 Isi maqta mein apni qalbi aarzu poora na hone ki taraf isharah karte huwe badi aajzi wa inkesari k saath dard bhare andaz me aap ne farmaya~

💔 Koi kyuñ puche teri baat RAZA
💔 Tujhse kutte hazaar phirte hai

Ye naat likh kar muwajahe shareef ke samne dast basta khade ho

💟 NAAM NIHAAD AHLE HADEES AUR UNKA DEEN

🌐 GAIR MUQALLIDEEN K DEEN KI BUNIYAAD DEEN MEIN FIQH O TAQLEED K INKAAR PER MUBNI HAI WO USKO KUFR O SHIRK KEHTA HAI AUR AAMIL BIL HADEES HONE KA DAAWA KARTA HAI

♻  AAYIYE ALLAH TA’ALA KYA IRSHAD FARMATA HAI MULAHEZA KARIYE

☪ وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنفِرُوا كَافَّةً ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَائِفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ

✳ AUR MUSALMANO SE YE TO HO NAHI SAKTA K SAB KE SAB NIKLE TO KYUN NA HO K UNKE GIROH MEIN SE EK JAMAAT NIKLE K DEEN KI SAMAJH HAASIL KARE AUR WAAPAS AAKAR APNI QAUM KO DARR SUNAYE IS UMEED PER K WO BACHEY.
📗   (SURAH TAUBA, AAYAT 122)


1⃣  IS AAYAT E KAREEMA SE MALUM HUA K DEEN MEIN FIQHI MASAEL SEEKHNA FARZ E KIFAAYA HAI KYUNKE HAR MOMIN TO ISKA HAAMIL NAHI HO SAKTA.

2⃣  HUKUM HUA K HAR GIROH SE EK TUKDA NIKLE AUR DEEN KI FIQH HAASIL KARE AUR WAAPAS AAKAR QAUM KO DARR SUNAYE AUR DEEN K FIQHI MASAEL BATAYE.

3⃣  FUQAHA APNI QAUM KO DARR SUNAYE YAANI EHKAAM E ILAAHI BATAYE K WO HARAAM O GUNAH SE BACHE.

4⃣  YE USI SURAT MEIN HOGA K QAUM FUQAHA KI TAQLEED KARE AUR UNKE HUKUM PER CHALE.

5⃣  IS AAYAT E KAREEMA MEIN TO قَوْمَهُمْ FARMAYA YAANI SAB QAUME APNE APNE

🎴 HAZRAT ALI AUR SEHED KI MAKHHIYA

Nabi-E-Kareem صلی اللہ تعالیٰ علیہ وآلہ وسلم Ne Ek Martaba Hazrat Ali رضي الله تعالي عنه Ko Ek Esi Qaum Ki Taraf Tabligh ke Liye Bheja Jo Sehed ki Makhkhhiya Palte The. Aapne Unhe Islam ki Daa'wat Di Unhone Inkar Kiya Aapne Sehad Ki Makhhiyo Se Farmaya~

AYE SEHAD KI MAKHHIYO ! TUM LOG IN LOGO KO CHOD KAR KAHIN AUR CHALI JAO YE SUNTE HI SEHED KI MAKHHIYA WAHA SE UDD GAI AUR QOUM KI KAROBARI HALAT TABAH HO GAI KYUNKI WO SEHAD KI MAKHHIYO KO PALTE THE AUR SEHAD KA KAROBAR KARTE THE.

Jab Qaum ka Karobar Band ho gaya To Majbur Ho Kar Nabi-E-Kareem صلی اللہ تعالیٰ علیہ وآلہ وسلم Ki Bargah Me Aaye Aur Apni Galti Ka Iqrar kiya Aur Arz Kiya Ke Aap Apne Muballigh Ko Bhejiye Hum Islam Qabool Kar Lenge Huzur صلی اللہ تعالیٰ علیہ وآلہ وسلم Ne Fir Hazrat Ali رضي الله تعالي عنه Ko Bheja Aapne Unhe Islam me Dakhil Kiya Fir Baa-Awaz-E Buland Farmaya~

SEHAD KI MAKHHIYO ! NABI E KAREEM  صلی اللہ تعالیٰ علیہ وآلہ وسلم KE SADQE ME TUM