पार्ट - 12 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा कारी तैयब साहब मोहतमिम दारुल उलूम देवभन्द लिखते हैं ~

(26). रसूल और उम्मते रसूल इस हद तक मुश्तरक हैं कि दोनों को इल्मे ग़ैब नहीं है।
#(फ़ारान का तौहीद नम्बर, सफा: 114 )

(27). हज़रत सय्यदुल अव्वलीन व आख़रीन के लिए इल्म ग़ैब का दावा और वह भी ईल्मेकुल्ली और इल्मे माकाना व मायकून की क़ैद के साथ न सिर्फ़ बेदलील और बे सनद है बल्कि मुख़ालिफ़ दलील मुआरिजे क़ु रआन और उस तौहीदी शरीअत के मिज़ाज के ख़िलाफ़ होने की वजह से नाकाबिले इलतिफ़ात है।
#( तौहीद नम्बर, सफा: 117)

(28). इल्मे माकाना व मायकून खास्सए ख दावन्दी है जिस में कोई भी ग़ैरूल्लाह उसका शरीक नहीं हो सकता ।
#(तौहीद नम्बर, सफा: 121)

पार्ट - 11 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा मौलवी अब्दुल शकूर साहब काकोरवी लिखते हैं .........

(22). फिक्ह हनफी की मोतबर किताबों में भी सिवाए खुदा के किसी को ग़ैबदाँ जानना और कहना नाजाएज़ लिखा है, बल्कि इस अकिदे को कुफ्र करार दिया है।
#(तोहफ़ए लासानी, सफा: 34 )

(23). हनफिया ने अपनी फिक्ह की किताबों में उस शख़्स को काफिर लिखा है जो यह अकीदा रखे कि नबी ग़ैब जानते थे।
#( तोहफ़ए लासानी, सफा: 38)

(24). रसूले खुदा सल्ल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की ज़ात वाला में सिफ़ते इल्मे ग़ैब हम नहीं मानते और जो माने उसको मना करते हैं।
#(नुसरते आसमानी, सफा: 27)

(25). हम यह नहीं कहते कि हुजूर ग़ैब जानते थे या ग़ैबदाँ थे बल्कि यह कहते हैं कि हुजूर को ग़ैब की बातों पर इत्तिला दी गई। फुकहाए हन्फिया कुफ्र का इतलाक उसी ग़ैब दान पर करते हैं न कि इत्तिला याबी पर।
#(फ़तेह हक़्क़ानी, सफा: 25)

पार्ट - 10 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा मौलवी अशरफ़ अली साहब थानवी लिखते हैं .......


(18). किसी बुजुर्ग या पीर के साथ ये अकीदा रखना कि हमारे सब हाल की उसको हर वक्त ख़बर रहती है। (कुफ्र व शिर्क है)
#(बहिश्ती ज़ेवर, जिल्द: 1, सफा: 27)

(19). किसी को दूर से पुकारना और यह समझना कि उसको ख़बर हो गई (कुफ्र व शिर्क है।)
#(बहिश्ती ज़ेवर, जिल्द: 1, सफा: 36 )

(20). बहुत से अम् र में आपका (यानी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का) ख़ास एहतिमाम से तवज्जह फरमाना और फिक्र व परेशानी में वाके होना और बावजूद इसके फिर मख़्फ़ी रहना साबित है। किस्सए इफ्क में आपकी तफ़तीश व इन्किशफात वा बलगे वोजूह सहाए में मज़कूर है मगर सिर्फ तवज्जह से इन्किशाफ़ नहीं हुआ।
#( हिफ़्जुल ईमान, सफा: 7)

(21). या शेख़ अबदुल क़ादिर या शैख़ सुलेमान का वज़ीफ़ा पढ़ना जैसा अवाम का अकीदा है।

पार्ट - 9 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा मौलवी रशीद अहमद साहेब गंगोही लिखते हैं ........


(15). इल्मे ग़ैब खास्साए हक़ तआला का है इस लफ़्ज़ को किसी तावील से दूसरे पर इतलाक करना इहामे शिर्क से खाली नहीं।
#(फ़तावाए रशीदिया, जिल्द :3, सफा: 43)

(16). जो शख्स रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इल्मे ग़ैब जो खास्साए हक तआला है साबित करे उसके पीछे नमाज़ न दुरुस्त है *"लि अन्नहू कूफरन"* क्यों कि यह कुफ्र है।
#(फ़तावाए रशीदिया, जिल्द: 3, सफा: 125 )

(17). जब अम्बिया अलैहिस्सलाम को भी इल्मे ग़ैब नहीं होता तो, या रसूलुल्लाह कहना भी नाजाएज़ होगा।
#( फतावाए रशीदाया, सफा: 3)

पार्ट - 08 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा मौलवी रशीद अहमद साहेब गंगोही लिखते हैं........

(12). और यह अकीदा रखना कि आप ( यानी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) को इल्मे ग़ैब था सरीह शिर्क है।
#(फ़तावाए रशीदिया, जिल्द: 2, सफा: 14)

(13). इस्वाते इल्मे ग़ैब ग़ैरे हक़ तआला को शिर्क सरीह है ।
#(फ़तावाए रशीदिया, जिल्द: 2, सफा: 17 )

(14). जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आलेमुलग़ैब होने का मोतकिद है वह सादाते हनफिया ( यानी उल्माए हनफिया) के नज़दीक कतअन मुश्रिक व काफिर है।
#( फतावाए रशीदाया, जिल्द: 3, सफा: 42)

पार्ट - 07 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के दीनी पेशवा मौलवी रशीद अहमद साहेब गंगोही लिखते हैं .......

(10). जो शख़्स अल्लाह जल्लशानहू के सिवा इल्म ग़ैब किसी दूसरे को साबित करे।।।। वह बेशक काफिर है उसकी इमामत और उससे मेल जोल मोहब्बत व मोवद्दत सब हराम है ।
#(फ़तावाए रशीदिया, जिल्द 2, सफा :10)

(11) इल्मे ग़ैब ख़ास्सऐ हक़ जल्लेशानहू है।
#(फ़तावाए रशीदिया, जिल्द: 1, सफा: 20 )

पार्ट - 06 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के इमामे अव्वल मौलवी इस्माइल साहब लिखते हैं ........

(9). जो अल्लाह की शान है उसमें किसी मख़लूक को दख़ल नहीं सो इसमें अल्लाह के साथ किसी मख़लूक को न मिलाओ। गो कोई कितना ही बङा हो और कैसा ही मुक़र्रब। मसलन यूं न बोले की अल्लाह व रसूल चाहेंगे तो फ़लाना काम हो जाएगा। कि सारा कारोबार जहाँ का अल्लाह ही के चाहने से होता है रसूल के चाहने से कुछ नहीं होता या कोई शख़्स किसी से कहे कि फ़लाँ के दिल में क्या है। या फ़लाँ की शादी कब होगी। या फ़लाँ दरख़्त में कितने पत्ते हैं। या आसमान में कितने सितारे हैं। तो इसके जवाब में यह न कहे कि अल्लाह व रसूल ही जाने। क्योंकि ग़ैब की बात अल्लाह ही जानता है रसूल को क्या ख़बर।
#(तकवियतुल ईमान, सफा : 58)

पार्ट - 05 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के इमामे अव्वल मौलवी इस्माइल साहब लिखते हैं ...…...

(7). अल्लाह साहब ने पैग़म्बर सलअम को फरमाया कि लोगों से यूं कह देवें कि ग़ैब की बात सिवाए अल्लाह के कोई नहीं जानता न फ़रिश्ते न आदमी न जिन न कोई चीज़ यानी ग़ैब की बात जान लेना किसी के एख़्तियार में नहीं।
#(तकवियतुल ईमान, सफा : 22)

(8). सो उन्होंने (यानी रसूले खुदा ने) बयान कर दिया कि मुझको न कुछ कुदरत है न कुछ ग़ैब दानी मेरी कुदरत का हाल तो यह है कि अपनी जान तक के भी नफा व नुकसान का मालिक नहीं तो दूसरे का तो क्या कर सकूं। और ग़ैबदानी अगर मेरे काबू में होती तो पहले हर काम का अन्जाम मालूम कर लेता अगर भला मालूम होता तो उसमें हाथ डालता अगर बुरा मालूम होता तो काहे को उसमे कदम रखता ग़र्ज़ कि कुदरत और ग़ैब दानी मुझ में नहीं और कुछ खुदाई का दावा नहीं फ़क़त पैग़ैम्बरी का मुझ को दावा है ।
#(तकवियतुल ईमान, सफा:24)

पार्ट - 04 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के इमामे अव्वल मौलवी इस्माइल साहब लिखते हैं .....…

(6). कुछ इस बात में भी उनको बङाई नहीं है कि अल्लाह साहब ने ग़ैब दानी एख़्तियार में देदी हो जिसके दिल को अहवाल जब चाहे मालूम करले या जिस ग़ैब का अहवाल जब चाहे मालूम करले कि वह जीता है या मर गया या किस शहर में है या जिस आइन्दा बात को जब इरादा कर लें दरियाफ्त कर ले कि फलां के यहाँ औलाद होगी या न होगी या उस सौदागरी में उसको फाएदा होगा या न होगा या लङाई में फतह पावेगा या शिकस्त कि इन सब बातों में भी सब बन्दे बङे हो या छोटे यह सब बेखबर हैं और नादान हैं।
#(तकवियतुल ईमान, सफा : 25)

पार्ट - 03 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के इमामे अव्वल मौलवी इस्माइल साहब लिखते हैं .........

(5). जो कोई किसी का नाम उठते बैठते लिया करे और दूर व नज़दीक से पुकारे या उसकी सूरत का ख़्याल बाँधे और यूं समझे कि मैं उसका नाम लेता हूं ज़बान से या दिल से या उसकी सूरत का या उसकी कब्र का ख़्याल बाँधता हूं तो वहीं उसको ख़बर हो जाती है और उस से मेरी कोई बात छुपी नहीं रह सकती और जो मुझ पर अहवाल खुज़रते हैं जैसे बीमारी व तन्दरुस्ती व कुशाइश व तंगी मरना व जीना ग़म व खुशी सब की हर वक्त उसे ख़बर रहती है और जो बात मेरे मुंह से निकलती है वह सब सुन लेते हैं। जो ख़्याल व वहम मेरे दिल में गुज़रता है वह सब से वाकिफ़ है सो इन बातों से मुश्रिक हो जाता है। और इस किस्म की बातें सब शिर्क है,,, ख़्वाह यह अकीदा अम्बिया व औलिया से रखे,ख़्वाह पीर व शहीद से ख़्वाह इमाम व इमाम ज़ादे से ख़्वाह भूत व परी से ख़्वाह यूं समझो कि यह बात उनको अपनी ज़ात से है ख़्वाह अल्लाह के दिये से ग़र्ज इस अकीदे से हर तरह शिर्क साबित होगा।
#(तकवियतुल ईमान, सफा:10)

पार्ट - 02 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के इमामे अव्वल मौलवी इस्माइल साहब लिखते हैं ........

(3). जो कोई यह दावा करे कि मेरे पास ऐसा कुछ इल्म है कि जब मैं चाहूं इस से गैब की बात मालूम कर लूं और आइन्दा बातों को मालूम कर लेना मेरे काबू में है सो वह बङा झूठा है कि दावा खुदाई का करता है और जो कोई किसी नबी वली या जिन व फरिश्ता को इमाम या इमामज़ादे या पीर व शहीद नुजूमी रुम्माल या जफ्फ़ारको या फ़ाल देखने वाले को या ब्राहमण इश्टी को या भूत व परी को ऐसा जाने और उसके हक़ में यह अकीदा रखे सो वह मुश्रिक हो जाता है।
#(तकवियतुल ईमान, सफा : 29)

(4). और इस बात में (यानी ग़ैब की बात न जानने में) औलिया अम्बिया और जिन व शैतान और भूत व परी में कुछ फ़र्क़ नहीं।
#(तकवियतुल ईमान, सफा : 8)

पार्ट - 01 | 🔥💥 ज़लज़ला 💥🔥 | 🕌 तस्वीर का पहला रुख़ 🕋

देवबन्दी जमाअत के इमामे अव्वल मौलवी इस्माइल साहब लिखते हैं ~

(1). जो कोई यह बात कहे कि पैग़म्बरे खुदा या कोई इमाम या बुजुर्ग ग़ैब की बात जानते थे और शरीअत के अदब से मुंह से न कहते थे सो वह बङा झूठा है बल्कि गैब की बात अल्लाह के सिवा कोई जानता ही नहीं।
#(तक़वियतुल ईमान, सफा: 27)

(2). किसी अम्बिया व औलिया या इमाम व शहीद की जनाब में हरगिज यह अकीदा न रखे न उसकी तारीफ में ऐसी बात कहे।
#( तक़वियतुल ईमान सफा : 26 )