▫Post --24 | 🎇 ZIKR-E-AALA HAZRAT 🌅

Ashraf Ali thanvi (DeObandi)  ne SARKAR Aala Hazrat ke WISAAL Ki Khabar Sunkar kaha tha.

"AHMAD RAZA" Jo Hume Kafir kehte
Hain Wo Ishq-e-Nabi ki Bina Par kehte Hain.

Dikhado DUNIYA ko ki Kya hai
Humare AULAMA-E-AHLE SUNNAT
HAMARE AKAABIR-E-AHLE SUNNAT
aur Unka Aqeeda

DAALDI QALB ME AZMATE MUSTAFA
Sayyadi Aalahazrat pe lakho Salam.

( SALLALLAHU ALIHI WA SALLAM )
( RADI ALLAHU TAALA ANHU )


पार्ट-- 11 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

💫 न्याज़ व फ़ातिहा .......⚡ ------------------------------------------------

(5). न्याज व फ़ातिहा की हो या कोई और खाने पीने की चीज़ उसको लुटाना, भीड़ में फेंकना कि उनकी बे अदबी हो पैरों के नीचे आये या नाली वग़ैरह गन्दी जगहों पर गिरे एक ग़लत तरीका है, जिस से बचना ज़रूरी है, जैसा कि मुहर्रम के दिनों में कुछ लोग पूड़ी, गुलगुले या बिस्किट वग़ैरह छतों से फ़ेंकते और लुटाते हैं यह ना मुनासिब हरकतें हैं।

(6). न्याज़ व फ़ातिहा यानी बुजुर्गों को उनके विसाल के बाद या आम मुरदों की रुहों को उनके मरने के बाद सवाब पहुंचाने का मतलब सिर्फ यहीं नहीं कि खाना पीना सामने रख कर और कुरआने करीम पढ़ कर ईसाले सवाब कर दिया जाये, बल्कि

पार्ट-- 10 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

💫 न्याज़ व फ़ातिहा.….... ⚡ ------------------------------------------------

(4). न्याज व फ़ातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या खुद परेशान होने की या उन कामों के लिए क़र्ज़ा लेने की या गरीबों मजदूरों से चन्दे करने की कोई ज़रूरत नहीं, जैसा और जितना मौका हो उतना करे और कुछ भी न हो तो खाली कुरआन या कलमा, ए, त़य्यबा या दुरूदशरीफ़ वग़ैरह का ज़िक्र करके या नफिल नमाज़ या रोज़े रख कर सवाब पहुंचा दिया जाये तो यह काफ़ी है, और मुकम्मल न्याज़ और पुरी फ़ातिहा है, जिस में कोई कभी यानी शरअ़न ख़ामी नहीं है, खुदा, ए, तआ़ला ने इस्लाम के ज़रिए बन्दों पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला ज़कात हो या स़दका, ए, फ़ित्र और कुरबानी सिर्फ उन्हीं पर फ़र्ज व वाजिब हैं जो साहिबे निसाब यानी शरअ़न मालदार हों, हज़ भी उसी पर फ़र्ज किया गया जिस के बस की बात हो, अ़क़ीक़ा व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत हैं जिनका मौका हो जब कि यह काम फ़र्ज व वाजिब या सुन्नत हैं, और न्याज व फ़ातिहा उ़र्स वग़ैरह तो सिर्फ बिदआ़ते ह़सना यानी सिर्फ अच्छे और मुस्तहब काम हैं, फर्ज व वाजिब नहीं हैं यानी शर अ़न लाजिम व ज़रूरी तो नहीं हैं, फिर न्याज व फ़ातिहा के लिए क़र्ज़, लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या जरूरत है, बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते खुद एक बड़ा कारे ख़ैर, सवाब का काम है,

ख़ुलासा यह कि

पार्ट-- 09 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

💫 न्याज़ व फ़ातिहा..…....... ⚡ ------------------------------------------------

(2). न्याजं फ़ातिहा में शेख़ी खो़री नहीं होनी चाहिए और न खाने पीने की चीज़ों में एक दूसरे से मुकाबिला बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ अल्लाह वालों के ज़रिए अल्लाह तआ़ला की नज़दीकी और उसका कुर्ब और रज़ा हासिल करने के लिए हो और अल्लाह के नेक बन्दों से मुहब्बत इस लिए की जाती है कि उन से मुहब्बत करने और उनके नाम पर खाने खिलाने और उन की रुहों को अच्छे कामों का सवाब पहुंचाने से अल्लाह राज़ी हो, और अल्लाह को राज़ी करना ही हर मुसलमान की ज़िन्दगी का असली मक़सद है।

(3). न्याज़ फ़ातिहा बुजुर्गों की हो या

पार्ट-- 08 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

💫 न्याज़ व फ़ातिहा ⚡ ------------------------------------------------

हज़रत इमाम रद़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किए गये उनको सवाब पहुंचाने के लिए

सदक़ा व ख़ैरात किया जाये

गरीबों मिस्किनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्ते दारों वग़ैरह को शरबत या खिचड़े या मलीदे वगै़रा कोई भी जाइजं खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाये,

और उसके साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाये तो और भी बेहतर है इस सब को उ़र्फ़ में नियाज़ फ़ातिहा कहते हैं

यह सब बिला शक जाइज़ और सवाब का काम है, और बुजुर्गों से इज़हारे अ़क़ीदत व मुहब्बत और उन्हें याद रखने का अच्छा त़रीका है लेकिन इस बारे में चन्द बातों का ध्यान रखना जरूरी है -

(1). न्याज़ व फ़ातिहा किसी भी हलाल और जाइज़ खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शरबत खिचड़े और

पार्ट-- 07 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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हम पहले ही लिख चुके हैं कि हज़रत इमाम हुसैन हों या दूसरी अ़ज़ीम इस्लामी शख़्सियतें उनसे असली सच्ची हक़ीक़ी मुहब्बत व अ़क़ीदत तो यह है कि उनके रास्ते पर चला जाये, और उन का रास्ता,, इस्लाम,, है,

पांचों वक़्त की नमाज की पाबन्दी की जाये,

रमज़ान के रोज़े रखे जायें,

माल की ज़कात निकाली जाये,

बस की बात हो तो ज़िन्दगी में एक मर्तबा ह़ज भी किया जाये,

जुए शराब ज़िना, सूद, झूट, गीबत, फिल्मी गानों, तमाशों और पिक्चरों वगैरह नाजाइज़ हराम कामों

पार्ट-- 06 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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दरअसल बात यह है कि सच्चाई में बहुत त़ाक़त है और ह़क़ ह़क़ ही होता है, और सर चढ़ कर बोलता है और ह़क़ की अहमियत उनके नज़दीक भी होता है जो ना ह़क़ पर हैं।

बहरे हाल इस में कोई शक नहीं कि एक बड़ी तादाद में हमारे सुन्नी मुसलमान अ़वाम भाई हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की मुहब्बत में ग़लत फ़हमियों के शिकार हो गए और मज़हब के नाम पर नाजाइज़ तफ़रीह और दिल लगी के काम करने लगे उनकी ग़लत फ़हमियों को दूर करने के लिए हम ने यह मज़मून मुरत्तब किया है ।

इस मुख़्तसर मज़मून में हम यह दिखायेंगे कि आज कल मुहर्रम के महीने में इस्लाम व सुन्नियत के नाम पर जो कुछ होता है इस में

पार्ट-- 05 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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और जब धरम के ठेकेदार उनमें सवाब बता देते हैं तो अ़वाम उन्हें और भी मज़ा ले कर करने लगते हैं कि यह ख़ूब रही, रंगरलियां भी हो गई और सवाब भी मिला, तफ़रीह और दिल लगी भी हो गई खेल तमाशे भी हो गये और जन्नत का काम, क़ब्र का आराम भी हो गया ।

*मौलवी साहब या मियां हुजूर ने कह दिया है कि सब जाइज़ व सवाब का काम है ख़ूब करो* और हमने भी ऐसे मौलवी साहब को ख़ूब नज़राना देकर खुश कर दिया है, और उन्होंने हम को तअ़ज़िये बनाने, घुमाने, ढोल बजाने और मेले ठेले लगाने और उन में जाने की इजाजत दे दी है ।

अल्लाह नाराज़ हो या उस का रसूल ऐसे मौलवियों और पीरों से हम ख़ूश और वह हम से खुश।

इस सब के बावजूद अ़वाम में ऐसे लोग भी काफ़ी हैं जो ग़लती करते हैं और इसको ग़लती समझते भी हैं और

पार्ट-- 04 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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और ऐसा लगने लगा कि जैसे इस्लाम भी मआ़ज़ल्लाह दूसरे मजहबों की तरह खेल तमाशों तफ़रीहों और रंग रिलियों वाला मज़हब है।

ख़ुद को मुसलमान कहलाने वालों में एक नाम निहाद इस्लामी फ़िर्का ऐसा भी है कि उन के यहां नमाज़ रोज़े वगैरह अह़कामे शरअ़ और दीन दारी की बातों को तो कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जाती बस मुहर्रम आने पर रोना पीटना, चीखना चिल्लाना, कपड़े फाड़ना, मातम व सीना कोबी करना ही उन का मज़हब है गोया कि उन के नज़दीक अल्ल्लाह तआ़ला ने अपने रसूल को इन्ही कामों को करने और सिखाने को भेजा था, और इन्ही सब बेकार बातों का नाम इस्लाम है।

मज़हबे अहले सुन्नत वलजमाअत में कुछ हिन्दुस्तान के पुराने ग़ैर मुस्लिमों जिन के यहां धर्म के नाम पर जूये खेले जाते हैं, शराबें पी जाती हैं, जगह जगह मेले लगा कर मर्दों, औरतों को जमा कर के ग़ैर इन्सानी हरकतें की जाती हैं, उनकी सोहबतों में रह कर उनके पास बैठने, उठने, रहने, सहने के नतीजे में खेल तमाशे और वाहियात भरे मेलों को ही इस्लाम समझने लगे, और

पार्ट-- 03 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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और गोया कि यह हुसैनी दिन हो गया, और बे शक़ ऐसा होना ही चाहिए, लेकिन मज़हबे इस्लाम एक सीधा सच्चा सन्जीदगी और शराफ़त वाला मज़हब है और उसकी हदें मुकर्रर हैं ।

लिहाजा इस में जो भी हो सब मज़हब और शरीअ़त के दाइरे में रह कर हो तभी वह इस्लामी बुजुर्गो की यादगार कहलायेगी और जब हमारा कोई भी तरीका मज़हब की लगाई चहार दीवारी से बाहर निकल गया तो वह ग़ैर इस्लामी और हमारी बुजुर्ग शख़्सियतों के लिए बाइसे बदनामी हो गया ।

हम जैसा करेंगे हमें देख कर दूसरे मज़हबों के लोग यही समझेंगे कि इन के बुजुर्ग भी ऐसा करते होंगे, क्योंकि क़ौम अपने बुजुर्गो और पेशवाओं का तआरुफ़ होती है,

हम अगर नमाज़े पढ़ेगे कुरआन की तिलावत करेंगे,

जूए शराब गाने बजाने और तमाशों से बच कर ईमान दार, शरीफ़ और

जब हम इस्लाम के ज़िम्मेदार ठेकेदार बन कर इस्लाम और इस्लामी बुजुर्गो के नाम पर ग़ैर इन्सानी हरकतें नाच कूद

पार्ट-- 02 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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हुज़ूर के इन सब क़रीबी लोगों से मुहब्बत रखना मुसलमान के लिए निहायत जरूरी है ।

हुज़ूर के अहले बैत हों या आप के सहाबी उन में से किसी को भी बुरा भला कहना या उनकी शान में गुस्ताख़ी और बे अदबी करना मुसलमान का काम नहीं है, ऐसा करने वाला गुमराह व बद दीन है उसका ठिकाना जहन्नम है।

हुज़ूर के अहले बैत में एक बड़ी हस्ती इमाम आली मक़ाम सैयदिना,, इमाम हुसैन,, भी हैं उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वह हुज़ूर के सहाबी भी हैं, और अहले बैत में से भी हैं,

यानी आप की प्यारी बेटी के प्यारे बेटे आप के प्यारे और चहीते नवासे हैं, रात रात भर जाग कर अल्लाह की इबादत करने वाले और कुरआने अ़ज़ीम की तिलावत करने वाले मुत्तक़ी इबादत गुज़ार, परहेज गार, बुजुर्ग, अल्लाह के बहुत बड़े वली हैं ।

साथ ही साथ मज़हबे इस्लाम के लिए राहे खुदा में गला कटाने वाले शहीद भी हैं, मुहर्रम के महीने की दस तारीख को जुमा के

पार्ट-- 01 | 🕌 मुह़र्रम में क्या जाइज़ 🕋

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प्यारे इस्लामी भाइयों !

मज़हबे इस्लाम में एक,, अल्लाह,, की एबादत ज़रूरी है साथ ही साथ उसके नेक बंदों से मुहब्बत व अ़क़ीदत भी ज़रूरी है। अल्लाह के नेक अच्छे और मुक़द्दस बन्दों से अस़ली, सच्ची और ह़क़ीक़ी मुहब्बत तो यह है कि

उन के ज़रीऐ अल्लाह ने जो रास्ता दिखाया है उस पर चला जाये,

उनका कहना माना जाये,

अपनी ज़िंदगी को उनकी ज़िंदगी की तरह बनाने की कोशिश की जाये,

इस के साथ साथ इस्लाम के दाइरे में रह कर उन की याद मनाना, उनका ज़िक्र और चर्चा करना, उनकी यादगारें क़ाइम करना भी मुहब्बत व अ़क़ीदत है,

और अल्लाह के जितने भी नेक और बरगुज़ीदा बन्दे हैं उन सब के सरदार उसके आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं, उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वह अल्लाह के रसूल होने के साथ साथ उसके महबूब भी हैं,